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उफ़ … एक ही देश में दो अलग अलग नियम … अहमदाबाद म्युनिसिपल कार्पोरेशन ने गणेश विसर्जन के लिए साबरमती नदी में प्रतिबन्ध लगाया था और नदी के किनारे कुंड बनाये थे जिसमे मूर्तियाँ डाली जाती थी .. इसके लिए भारी पुलिस बंदोबस्त भी था ..

लेकिन उसी गुजरात में मुसलमानों के लिए अलग कायदा … उन्होंने कल खुबसूरत साबरमती रिवरफ्रंट पर ताजिया विसर्जन किया .. पूरी नदी को गंदगी से भर दिया .. लेकिन उन्हें रोकने टोकने के लिए न पुलिस थी न ही म्युनिसिपल कार्पोरेशन के अधिकारी थे

शेयर करें ताकि सब लोग तक ये बात पहुंचे👍👍

yada yada hi dharmasya glanir bhavati bharata meaning

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यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भव- ति भारत ।

अभ्युत्थान- मधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्- ॥४-७॥

परित्राणाय- साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्- ।

धर्मसंस्था- पनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥४-८॥

अर्था�¤- �्थ:

जब जब भी धर्म का विनाश हुआ, अधर्म का उत्थान हुआ,

तब तब मैंने खुद का सृजन किया, साधुओं के उद्धार और बुरे कर्म करने वालो के संहार के लिए,

धर्म की स्थापना के प्रयोजन से, मै हर युग में, युग युग में जनम लेता रहूँगा।

पहà- ��े समझ ले कि श्री कृष्ण ने “मैं ” किसको कहा है ?

“मैं ” सृष्टा या रचयिता को कहा है, और सृष्टा और कोई नहीं स्वयं सृष्टि ही है (क्रिएशन इस दी क्रिएटर इटसेल्फ)

अब ये समझ ले कि धर्म क्या है?

धर्म कोई जाति विशेष की तरफ नहीं अपितु इस पूरी सृष्टि को जो चलायमान रखता है उसको कहा गया है।

कही कोई ऊपर आसमान में कोई भगवान् या खुदा नहीं है जो सब कर रहा है।

गौतम बुद्ध ने जिसे धम्म कहा, गुरु नानक ने जिसे हुक्म कहा।

इन तथ्यों को समझते हुए अब जानते है इस श्लोक का अर्थ :-

“तो जब जब इस सृष्टी को चलायमान रखने वाले नियम में कोई अवरोध उत्पन्न करता है”,

अवरोध कौन और कैसे उत्पन्न कर सकता है?

सृष्टि के स्वाभाविक रूप से चलायमान होने में जब मनुष्य बहुत ज़्यादा हस्तक्षेप करता है, वो अवरोध है।

“तब तब ये सृष्टि (सृष्टि ही सृष्टा है),नियम की स्थापना के लिए उन मनुष्यो की संहारक तथा जो इस सृष्टि के चलायमान होने में सहायक है उन मनुष्यो के उत्थान के लिए सदैव अपने आप में परिवर्तन करती रहेगी।”

इस श्लोक से भगवान् श्री कृष्ण ये उपदेश देना चाह रहे है की जितना हम इस सृष्टि के चलने में सहायक होंगे उतना ही ये सृष्टि हमारे अनुकूल होगी।

तथा जितना हम इसके प्रवाह में बाधक बनेंगे उतना ही प्रतिकूल परिणाम हमें प्राप्त होंगे।

This is the famous verse from Shrimad Bhagvad Gita,

“Yada yada hi dharmasya glanirbhavati bharata

Abhythanamadharmasya tadatmanam srijamyaham”

Paritranaya sadhunang vinashay cha dushkritam

Dharmasangsthapanart- hay sambhabami yuge yuge

which means:-

“Whenever, O descendant of Bharata, there is decline of Dharma, and rise of Adharma, then I body Myself forth. For the protection of the good, for the destruction of the wicked, and for the establishment of Dharma I come into being in every age.”

Let’s first understand what Shri Krishna is meaning by”I”

“I” is the creator, and creator is none other than the creation itself.

Let’s now understand what is “DHARMA”

“DHARMA” is not being referred to any religion or sect, but the cosmic law which is prevailing,

and is everlasting in the process of Creation is “DHARMA”

There is no one up in the sky sitting and organising things but the cosmic law.

Gautam “The Buddha” called it “DHAMMA”, Guru Nanak called it “HUKM”.

Now if we keep these points under consideration then the verse would mean as under:-

“Whenever there is any hindrance or interruption in the process of creation by anybody.”

Who can and how can interrupt or hinder the process?

The cosmic law of the creation is hindered by excessive interference done by the Human Beings.

“Ever & Ever when this will happen the creation will be adversely effecting the people involved in hindering and will be

co-operating with the people involved in its smooth functioning.”

How will this happen?

How will the creation distinguish?

The cosmic law is omnipresent in the process of creation

We human beings are also a part of it.

To sum it all up my understanding says that Bhagwan Shri Krishna wanted to send this message across the entire Human Race:-

“THE MORE WE WILL IN FLOW AND IN SYNC WITH NATURE, THE MORE REWARDING THE NATURE WILL BE FOR ALL,

THE MORE WE WILL BE AGAINST NATURE, THE MORE ALL WILL BE ADVERSELY EFFECTED”

इंस्पेक्टर ने दिया एसपी को गाली ..

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.चेहरे पर गमछा, पैर में चप्पल व टूटी साइकिल पर सवार होकर रात की सैर करने पटना के एसएसपी शहर में निकल पड़े। आर ब्लॉक चौराहे पर खड़ी पुलिस जिप्सी के पास पहुँच इंस्पेक्टर को फरियाद लगाई कि मेरा पैसा लूट लिया गया है। इंस्पेक्टर ने बात सुनने के बाद उसे भागने को कहा।
लेकिन वे जब नहीं हटे तो इंस्पेक्टर ने गाली देते हुए भागने को कहा और मारने के लिए जीप से उतरा। वो अपना हाथ चलाता इससे पहले उस व्यक्ति ने चेहरे से अपना गमछा उतार दिया और कहा, यू आर सस्पेंडेड मिस्टर विपिन कुमार।
ये थे एसएसपी मनु महाराज,
एसएसपी ने मंगलवार की रात 11 बजे वेश बदल कर पुलिस की मुस्तैदी का जायजा लिया। वे गांधी मैदान, आरब्लॉक, एक्जिबिशन रोड, राजेंद्रनगर, करबिगहिया आदि इलाकों में साइकिल से ही गए। हमें गर्व है ऐसे पुलिस कप्तान पर, काश सब पुलिस वाले ऐसे ही होते,
बिहार स्वर्ग बन गया होता।

एक सलाम एसएसपी मनु महराज के नाम !!

ये भक्ति शर्मा हैं..

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भारत की 100 प्रभावी महिला में शामिल भक्ति शर्मा अमेरिका से लौटी हैं अब मध्यप्रदेश में एक ग्राम पंचायत की सरपंच है। अपने साथ हमेशा एक पिस्टल रखती हैं। इनके गांव में बहुत सारे खास काम होते हैं, यहां एक सरपंच योजना चलती है.. किसान को मुआवजा मिलता है। हर आदमी का बैंक अकाउंट है और हर खेत का मृदा कार्ड.. कुछ ही वर्षों में इन्होंने अपने गांव की तस्वीर बदल दी है.. पढ़िए इनकी सफलता की कहानी…
भक्ति शर्मा ने एमए राजनीति शास्त्र से किया है, अभी वकालत की पढ़ाई कर रही हैं। भोपाल जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर बरखेड़ी अब्दुल्ला ग्राम पंचायत है। इस पंचायत की सरपंच भक्ति शर्मा के शौक पुरुषों जैसे हैं। इन्हें ट्रैक्टर चलाना, पिस्टल रखना, अपनी गाड़ी से सड़कों पर फर्राटे भरना, किसी भी अधिकारी से बेधड़क बात करना पसंद है। ये अपनी बोलचाल की भाषा में भी जाता है, खाता है, आता हूँ का प्रयोग सामान्य तौर पर करती हैं। इस पंचायत में कुल 2700 जनसँख्या है जिसमे 1009 वोटर हैं। ओडीएफ हो चुकी इस पंचायत में आदर्श आंगनबाड़ी से लेकर हर गली में सोलर स्ट्रीट लाइटें हैं।
“सरपंच बनते ही सबसे पहला काम हमने गांव में हर बेटी के जन्म पर 10 पौधे लगाना और उनकी माँ को अपनी दो महीने की तनख्वाह देने का फैसला लेकर किया। पहले साल 12 बेटियां पैदा हुई, माँ अच्छे से अपना खानपान कर सके इसलिए अपनी यानि सरपंच की तनख्वाह ‘सरपंच मानदेय’ के नाम से शुरू की।”

भक्ति ने कहा, “हमारी पहली ऐसी ग्राम पंचायत बनी जहाँ हर किसान को उसका मुआवजा मिला। हर ग्रामीण का राशनकार्ड, बैंक अकाउंट, मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनवाया। इस समय पंचायत का कोई भी बच्चा कुपोषित नहीं है। महीने में दो से तीन बार फ्री में हेल्थ कैम्प लगता है।
भक्ति ने कहा, “हमारी पहली ऐसी ग्राम पंचायत बनी जहाँ हर किसान को उसका मुआवजा मिला। हर ग्रामीण का राशनकार्ड, बैंक अकाउंट, मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनवाया। पहले साल में 113 लोगों को पेंशन दिलानी शुरू की, इस समय पंचायत का कोई भी बच्चा कुपोषित नहीं है। महीने में दो से तीन बार फ्री में हेल्थ कैम्प लगता है, जिससे पंचायत का हर व्यक्ति स्वस्थ्य रहे।”
ग्राम पंचायत का कोई भी काम भक्ति अपनी मर्जी से नहीं करती हैं। पंचों की बैठक समय-समय पर अलग से होती रहती है। जब ये सरपंच बनी थीं तो इस पंचायत में महज नौ शौचालय थे अभी ये पंचायत ओडीएफ यानि खुले में शौच से मुक्त हो चुकी है। भक्ति का कहना है, “हमने पंचायत में कोई भी काम अलग से नहीं किया, सिर्फ सरकारी योजनाओं को सही से लागू करवाया है। पंच बैठक में जो भी निर्धारित करते हैं वही काम होता है। ढ़ाई साल में बहुत ज्यादा विकास तो नहीं करवा पाए हैं क्योंकि जब हम प्रधान बने थे उस समय गांव की सड़कें ही पक्की नहीं थी, इसलिए पहले जरूरी काम किए।”
भक्ति ने अपने प्रयासों से अपनी पंचायत को सरकार की मदद से एक बड़ा सामुदायिक भवन पास करा लिया है। भक्ति का कहना है, “आगामी छह महीने में इस भवन में डिजिटल क्लासेज शुरू हो जायेंगी, जो पूरी तरह से सोलर से चलेंगी। इसमें महिलाओं के लिए सिलाई सेंटर, और चरखा केंद्र खुलेगा। किसानों के लिए समय-समय पर बैठकें होंगी, जिससे वो खेती के आधुनिक तरीके सीख सकें। बच्चों के लिए तमाम तरह की गतिविधी होंगी जिससे उन्हें गांव में शहर जैसी सुविधाएँ मिल सकें।”
पंचायत की हर महिला निडर होकर रात के 12 बजे भी अपनी पंचायत में निकल सके भक्ति शर्मा की ऐसी कोशिश है। भक्ति ने कहा, “पंचायत की हर बैठक में महिलाएं ज्यादा शामिल हों ये मैंने पहली बैठक से ही शुरू किया। मिड डे मील समिति में आठ महिलाएं है। महिलाओं की भागीदारी पंचायत के कामों में ज्यादा से ज्यादा रहे जिससे उनकी जानकारी बढ़े और वो अपने आप को सशक्त महसूस करें।”
पहाड़ी क्षेत्र होने की वजह से ग्राम पंचायत में पानी की बहुत समस्या है। पीने के पानी के लिए तो सबमर्सिबल लगा है लेकिन खेती को समय से पानी मिलना थोड़ा मुश्किल होता है। भक्ति का कहना है, “जिनके पास 1012 एकड़ जमीन है, हमारी कोशिश है वो हर एक किसान कम से कम एक एकड़ में जैविक खेती जरुर करें। बहुत ज्यादा संख्या में तो नहीं लेकिन किसानों ने जैविक खेती करने की शुरुआत कर दी है।”

कदम मिलाकर चलना होगा

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उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

राजनीती के रजनीकांत

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#राजनीती_के_रजनीकांत…
________ वो कहते हैं ना मानो या मानो, जिस दिन नरेंद्र मोदी प्रचार मोड़ में आये ना, आप देखेंगे कि ये नोटा फोटा की सारी गणित धरी रह जाएगी।
ठीक है कि भारत की राजनीति में बड़े बड़े दिग्गज नेता हुए हैं लेकिन शायद ही कोई इस बात पर विश्वास ना करे कि नरेंद्र मोदी ने इन सब के बीच एक अलग जगह पाई है। जैसे भारतीय सिनेमा में अच्छे अच्छे सुपरस्टार होते हुए भी रजनीकांत एकलौते मेगास्टार हैं वैसे ही नरेंद्र मोदी भी निसंदेह राजनीति में एक_मेव मेगास्टार हैं।
अब इसका श्रेय चाहे तो कोई इंटरनेट युग को दे,
या इस मेगास्टार के डायरेक्टर प्रोड्यूसर को दे,
लेकिन नरेंद्र मोदी खुद ही अपने आप में एक ब्रांड चेहरा हैं जो किसी भी डायरेक्टर प्रोड्यूसर के हाथ लगे, घाटे का सौदा तो हो ही नहीं सकता। जबकि नरेंद्र मोदी के वर्त्तमान डायरेक्टर (अगर आप उनको डायरेक्टर मानते हो तो) वो तो पहले भी सुपरहिट फिल्म का निर्माण कर चुके हैं। अच्छा अब 2014 की तुलना में प्रोडक्शन हाउस भी तो अच्छी स्थिति में है। सरकार जिस किसी पार्टी की होती है वह पार्टी इस लिहाज से थोड़ी तो फायदेमंद होती ही है, भले ही आप मानो या ना मानो।
मोदी को मेगास्टार बनाने में इनके विरोधियों ने भी जाने अंजाने बहुत योगदान दिया है। मोदी नाम किसी ना किसी कारण हमेशा चर्चा में रहा है। चर्चाओं में बड़ाई हुई सो हुई लेकिन अगर बुराई भी हुई है तो उतनी बार फिर से बड़ाई भी हुई है।
कहते हैं कि ध्वनि कभी मरा नहीं करती, यह ब्रम्हांड में तैरती रहती है। अब आप सोचिये कि पिछले चार सालों में भारतियों और विदेशियों की जुबान पर कितनी बार मोदी का नाम आया होगा। केवल मोदी का ही नहीं, बहुत बार राहुल गाँधी का नाम भी आया है। विदेशों की छोड़ दें तो केजरीवाल सरीखे नेताओं का नाम भी गूंजा तो है। लेकिन नाम लेते समय लोगों का भाव भी महत्वपूर्ण है, कि कौनसा नाम किस भाव के साथ लिया गया। तो इन सबके नाम, ध्वनि के रूप में अपने साथ अच्छे बुरे भाव लिए ब्रम्हांड में अब भी विचरण कर रहे हैं। कल्पना कीजिये कि अगर देवगण सुनते होंगे तो क्या प्रतिक्रिया देते होंगे? अच्छा आप यदि देवी देवताओं को नहीं मानते तो कोई बात नहीं, आपके हिसाब से कोई एलियन वेलियन तो सुन रहा होगा ना इन ध्वनियों को। मैं क्या बोलता हूँ अबके चुनाव में चीन, पाकिस्तान, रसिया, फ़्रांस या अमेरिका ही नहीं बल्कि कुछ ब्रम्हांडिय शक्तियां भी हस्तक्षेप करने आएँगी और चुनाव के बाद चोंका देने वाले नतीजे जो सामने आएंगे।
खैर गंभीरता से देखो तो नरेंद्र मोदी को राजनीति का रजनीकांत कहने का कारण यह है कि
वो आपके नाराज होने के डर से भी कठोर निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते। साहस था इतना तभी तो नोटबंदी जैसा कदम उठाया गया, जबकि देखा देखी एक छोटे से देश ने नोटबंदी करने का फैसला लिया था वहाँ की व्यवस्था तीन दिन में चौपट हो गई। वहीँ दूसरी तरफ यह रजनीकांत आपको मनाना भी खूब जानता है। आप जो अभी तलक नाराज हो ना आप कुछ नहीं कर पाओगे, आप कितना भी नफरत करना चाहो आप नहीं कर पाओगे। उतरने तो दो चुनावी अखाड़े में रजनीकांत को, तेज है जी ऐसा कि आप स्वतः ही खींचे चले आओगे।
बाकि बात बाद में अभी मोदी जी के साथ मीटिंग को लेट हो रिया हूँ…😂😂😂
ऐसी पोस्ट देखकर लोग तो यही सोचते हैं कि मुझे मोदी जी पगार दे रहे हैं।

मेरी_जान_यही_तो_लोकतंत्र_है

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मेरी_जान_यही_तो_लोकतंत्र_है
और लोकतंत्र में राजनीति बहुत जरुरी है।
राजनीति को बर्दाश्त करना लोकतंत्र की मज़बूरी है।
जब लोकतंत्र है मौन, तो आप और मैं कौन?
अगड़े पिछड़े की राजनीति ताजा ताजा गर्म गर्म…?
सोशल मीडिया पर IT सेल वालों ने काम सँभाल लिया है। हर तरह के हथकंडे अपनाये जा रहे हैं माहौल बनाने के लिए। आप किसी पार्टी विशेष के लिए कुछ लिख के खुद आजमा सकते हैं।
पहले एक IT प्रभारी आएगा आपको लपेटने को, आपने उसे जवाब दे दिया तो दूजा IT प्रभारी तैयार होगा। फिर कई लोग उन प्रश्नों को और उत्तरों को पढ़ेंगे। तब तक IT डिपार्टमेंट से कई फोटोशॉप सामग्री आपके पोस्ट पर उड़ेल दी गई होगी।
अच्छा भला कन्फ्यूज हो सकता है कि कहाँ जाएँ,
अपने अधिकारों के लिए खड़े हों या अपने नेता के लिए।
लेकिन सब चलता है जी,
अपना नाम छुपा कर चेहरा छुपाकर इस प्रकार का प्रचार बाकायदा दंडनीय अपराध है लेकिन ये भी चुप और वो भी चुप। क्या कहें जी यही तो लोकतंत्र है।
अलिखित एग्रीमेंट है कि
तू भी बेईमान और मैं भी बेईमान।
मैं तुझे नहीं जानता तू मुझे मत पहचान।
खैर अभी 2018 का सितंबर माह है और राजनीति के पेड़ पर बस कलियाँ खिली हैं। कोशिस भी ना करो अंदाजा लगाने की कि फल कैसे निकलेंगे। क्योंकि ना तो आपको खाद का पता, कि कौनसी डाली जा रही है। आप नहीं जानते बीज किस किश्म का रोपा गया है। हवा की दिशा से या आसमान में बादलों को देखकर अंदाजा ना लगाइये, यह राजनीति मौसम पर निर्भर नहीं है।
राजनीति की फसल से लाभ लेने के लिए बड़ी जालिम किश्म की बुद्धि खाद के रूप में काम ली जाती है।
मत लड़ो, मत उलझो, पहले समझो कि आप जिन बातों पर तुरंत रियेक्ट कर रहे हो उनके पीछे क्या कुछ है जो आप जानते ही नहीं हो। कोई आपका साथी ये सलाह नहीं देगा जो मैं दे रहा हूँ। खामखा अपना रिएक्शन ख़राब मत करो, इंतजार करो थोड़ा सा, आपका अपना नजरिया कल कुछ और होगा जब फल पक के टपकने लगेंगे इस पेड़ से। अपना संयम बनाये रखो, क्योंकि अंदाजे सब धरे रह जायेंगे। मैंने भी आंकलन करना छोड़ दिया है और बन के दर्शक आ बैठा हूँ… कहाँ…
अरे भाई आपके बाजु में😊
पॉपकॉर्न शॉपकोर्न कुछ ठंडा गर्म तैयार करो 19 का मैच साथ में देखेंगे।
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