First blog post

Sticky

This is your very first post. Click the Edit link to modify or delete it, or start a new post. If you like, use this post to tell readers why you started this blog and what you plan to do with it.

post

Advertisements

आत्मा की आवाज

Standard

🍃..एक राजा ने एक सुंदर सा महल बनाया और महल के मुख्य द्वार पर गणित का एक सूत्र लिखवाया और घोषणा की कि जो भी इस.सूत्र को हल कर के द्वार खोलेगा द्वार खुल जाएगा और मैं उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दूँगा।

राज्य के बड़े-बड़े गणितज्ञ आये और सूत्र देखकर लौट गए ।किसी को कुछ समझ नहीं आया।

आखिरी तारीख आ चुकी। उस दिन 3 लोग आये और कहने लगे हम इस सूत्र को हल कर देंगे ।उसमें 2 तो दूसरे राज्य के बड़े गणितज्ञ अपने साथ बहुत से पुराने गणित के सूत्रों की किताबों सहित आये लेकिन एक व्यक्ति जो साधक की तरह नजर आ रहा था सीधा साधा कुछ भी साथ नहीं लाया। उसने कहा मैं बेठा हूँ यहीं पास में ध्यान कर रहा हूँ पहले ये दोनों महाशय कोशिश कर के
द्वार खोल दे तो मुझे कोई परेशानी नहीं ।पहले इन्हें मौका दिया जाए।

दोनों गहराई से सूत्र हल करने में लग गए लेकिन नहीं कर पाये और हार मान ली।

अंत में उस साधक को ध्यान से उठाया गया और कहा कि आप सूत्र हल कीजिए,आप का समय शुरू हो चुका है।

साधक ने आँखें खोली और सहज मुस्कान के साथ द्वार की ओर चला ,
द्वार को धकेला और यह क्या द्वार खुल गया..

राजा ने साधक से पूछा कि आप ने ऐसा क्या किया। साधक ने कहा कि जब मैं ध्यान में बैठा तो सबसे पहले अंतर्मन से आवाज आई कि पहले चेक कर लो कि सूत्र है भी या नहीं,इसके बाद इसे हल करने की सोचना और मैने वही किया।

ऐसे ही कई बार…

*जिंदगी में समस्या होती ही नहीं*
और हम *विचारो में उसे इतनी बड़ी बना लेते हैं कि वह समस्या कभी हल न होने वाली है।*

लेकिन हर समस्या का उचित उपाय *आत्मा की आवाज हैं ।

खुदीराम के साथी

Standard

….आ रहा है 10 दिसंबर ..खुदी राम के साथी ..मुज्जफ्फर पुर बम काण्ड में अपनी ही गोली से शहीद होने का मार्ग जिन्होंने ‘ आजाद ‘ को दिखाया ..
10 दिसम्बर 1888 में ग्राम बिहारी ..जिला बोगरा ( आज का बांग्लादेश ) में ही जन्मे थे ” प्रफुल्ल चाकी ” .कक्षा 9 का क्षात्र रंगपुर के जिला स्कूल से निकाल दिया गया … किन्तु रंगपुर नेशनल स्कूल में क्रांति दीक्षा लेकर अमर शहीद ” खुदीराम बोस ” ..के साथ बदनाम जज किंग्स्फोर्ड को सजाये मौत देने जा पहुंचे ..’ मुज्ज्क़फरपुर ‘ ,, इन्हें याद कीजिये ,,, ..प्रफुल्ल चाकी .!!!
क्या आपने यह नाम सुना है ???……किग्स्फोर्ड हत्याकांड जिसे इतिहास ” मुजफ्फरपुर कांड ” के नाम से जानता है.. ..खुदीराम बोस के साथी ” प्रफुल्ल चाकी ” की तस्वीर है यह …..बम का सफल हमला कर कुख्यात किंग्स्फोर्ड जो की कलकत्ता का प्रेसिडेंसी मैजिस्ट्रेट रहते हुए देशभक्तों को कठोर सजाएँ देने के लिए बदनाम था को सबक सिखाने का एक प्रयास था यह ” भारतीय प्रतिकार ” था किन्तु .. दुर्भाग्य ….किंग्स्फोर्ड उस वक्त अपनी ‘ विक्टोरिया ‘ में नहीं था ..दो महिलाएं जिनको विक्टोरिया छोड़ने जा रही थी मारी गईं ..यह 30 अप्रेल 1908 की रात थी ..खुदीराम और प्रफुल्ल चाकी अलग-अलग रास्तों से आपने गंतव्य की ऑर बढ़ चले ..पूरी रात भागते हुए जहाँ खुदीराम भारतीय पुलिस के कुत्तों द्वारा ‘ बेनी ‘ रेलवे स्टेश न के बहार पकडे गए …वहीँ प्रफुल्ल चाकी ” मोकामा घाट ” स्टेशन पर खुपिया पुलिस के कुत्ते ” नन्द लाल बैनर्जी ” की मुखबिरी में एकत्रित ब्रितानी हुकूमत के पालतू कुतों से मुठभेड़ करते हुए शहीद हुए …जब चाकी ने देखा की पोलिस की पकड़ से जीवित बचना संभव नहीं तो …तो आने वाले कल के ” आजाद ” के लिए एक उदाहरण स्थापित करते हुए अंतिम गोली का प्रयोग अपने लिए किया और ब्रिटिश कुत्तों के हाँथ उनकी नश्वर देह आई ..यह चित्र ब्रिटिश बर्बरता का नमूना है ..जहाँ सम्मान स्वरुप एक ‘ कफ़न ‘ भी मुहैया नहीं कराया गया ..हमारा पूरा इतिहास शहीदों की कुर्बानियों से भरा हुवा है ……..किन्तु ” जाती-धर्म-भाषा की राजनीती ” करने वाले ‘ ब्रिटिश सत्ता के आज के उत्तराधिकारियों ‘ को देशभक्त युवाओं से कोई चुनौती ना मिले अतः ” क़ुरबानी के इन स्मारकों ” को उनसे जुदा करने की हर ” नापाक कोशिश “…… जारी है ,, वहीँ अपने आदर्शों को याद रखना हमारा कर्त्तव्य है .!!! सहमत हैं ??… आगे आयें .!!! …….जयहिंद .!!!!!

Source : fb

मौलाना अबुल कलम आज़ाद

Standard

11 नवम्बर 1888 को पैदा हुए मक्का में, वालिद का नाम था ” मोहम्मद खैरुद्दीन” और अम्मी मदीना (अरब) की थीं। नाना शेख मोहम्मद ज़ैर वत्री ,मदीना के बहुत बड़े विद्वान थे। मौलाना आज़ाद अफग़ान उलेमाओं के ख़ानदान से ताल्लुक रखते थे जो बाबर के समय हेरात से भारत आए थे। ये जब दो साल के थे तो इनके वालिद कलकत्ता आ गए। सब कुछ घर में पढ़ा और कभी स्कूल कॉलेज नहीं गए। बहुत ज़हीन मुसलमान थे। इतने ज़हीन कि इन्हे मृत्युपर्यन्त “भारत रत्न ” से भी नवाज़ा गया। इतने काबिल कि कभी स्कूल कॉलेज का मुंह नहीं देखा और बना दिए गए भारत के पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्री। इस शख्स का नाम था “मौलाना अबुल कलम आज़ाद “।

सही मायने में देखा जाये तो आजाद पूरे भारत को मुगलिस्तान के रूप में देखना चाहते थे।
उन्होंने एकबार भारत के इस्लामीकरण की वकालत करते हुए कहा था कि ‘ भारत जैसे देश को जो एक बार मुसलमानों के शासन में रहा चुका है ,कभी भी त्यागा नहीं जा सकता और प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है कि उस खोई हुई मुस्लिम सत्ता को फिर प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करे ‘ (बी.आर.नन्दा , गांधी पैन इस्लामिज्म , इम्पीरियलिज्म एण्ड नेशनलिज्म, पृ. ११७)
आबादी का अदला-बदली प्रस्ताव को इन्होंने ही गांधी व नेहरू के द्वारा ठुकरवा दिया था। जिससे भारत को फिर इस्लामिक चंगुल में फंसाया जा सके।
अक्टूबर, 1947 में पाकिस्तान बनने की मांग पूरी होने पर जब हज़ारों की संख्या में दिल्ली के मुसलमान अपने इस्लामी मुल्क पाकिस्तान जा रहे थे तो जामा मस्जिद की प्राचीर से मौलाना ने उन्हें जाने से रोका और कहा-
“जामा मस्जिद की ऊंची मीनारें तुमसे पूछ रही हैं कि कहाँ जा रहे हो, तुमने भारत के बुलंद इस्लामी इतिहास के पन्नों को कहाँ खो दिया। कल तक तुम यमुना के तट पर वजू किया करते थे और आज तुम यहाँ रहने से डर रहे हो। याद रखो कि तुम्हारे ख़ून में दिल्ली बसी है। तुम समय के इस झटके से मत डरो।
उनकी और गांधी की अपीलों के कारण अलग मुल्क की हसरत रखने वाले लाखों मुसलमानों ने पाकिस्तान जाने का ख्याल छोड़ दिया और भविष्य में देश का एक और विभाजन होने की संभावना उसी समय से आरंभ हो गयी।
उनकी पत्रिका ‘अंजमने-तारीकी-उर्दू’ के सामने समस्या आई तो उन्होंने अपने कांग्रेसी शिक्षा मंत्रालय की ओर से अंजमन को 48,000 रूपए प्रति माह के अनुदान की मंजूरी दिलाई। परन्तु इस अनुदान का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया, और अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वित्तीय संकट के समय में उनके मदद के लिए देते रहे।
उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘इंडिया विन्स फ्रीडम’ में लिखा कि-
‘लोगों को यह सलाह देना सबसे बड़े धोखों में से एक होगा कि भौगोलिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से भिन्न क्षेत्रों को धार्मिक संबंध कभी जोड़ भी सकते हैं।’
हमारे वामपंथी लेखक इन बड़ी चालाकी से इन वाक्यों को मौलाना के हिन्दू-मुस्लिम एकता की भावना से जोड़ कर लिखते हैं।

इन्होने इस बात का ध्यान रखा कि विद्यालय हो या विश्वविद्यालय कहीं भी इस्लामिक अत्याचार को ना पढ़ाया जाए. इन्होने भारत के इतिहास को ही नहीं अन्य पुस्तकों को भी इस तरह लिखवाया कि उनमे भारत के गौरवशाली अतीत की कोई बात ना आए. आज भी इतिहास का विद्यार्थी भारत के अतीत को गलत ढंग से समझता है.
हमारे विश्वविद्यालयों में – गुरु तेग बहादुर, गुरु गोबिंद सिंह, बन्दा बैरागी, हरी सिंह नलवा, राजा सुहेल देव पासी, दुर्गा दास राठौर के बारे में कुछ नहीं बताया जाता..
अबुल कलाम आजाद की जन्म जयन्ती की याद में ११ नवम्बर को “राष्ट्रीय शिक्षा दिवस” के रूप में मनाया जाता है। यद्यपी, ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में यह कितनी बडी हास्यास्पद बात है, यह अधिकांश लोग नहीं जानते। वास्तव में, नेहरू द्वारा मौलाना आजाद को स्वतन्त्र भारत का पहला शिक्षा मंत्री बनाना भी इस देश के लिए एक विडम्बना ही थी।

उनकी एक मात्र अंग्रेजी पुस्तक कुरान का अनुवाद है, जो शुद्ध मजहबी है। दूसरी “इन्डिया विन्स फ्रिडम” भी राजनीतिक है। यह किताब भी मौलाना आजाद ने अपने सहयोगी हुमायू कबीर को बताकर लिखवायी थी। वे बातें उर्दू में कही गई, जिसका अनुवाद कर कबीर ने अंग्रेजी में पुस्तक लिखी।
सन् 1920 में आजाद ने मुसलमानों के लिए ‘हिजरत’, यानी भारत छोडकर मुस्लिम देशों में प्रस्थान के लिए तैयार रहने का फतवा भी जारी किया था। यह भारत-भूमि से उनके भावनात्मक सम्बन्धों के अभाव का भी प्रमाण है। उन्होंने अंग्रेजों से लडाई को ‘जिहाद’ कहा था। निसन्देह, यह सब उन्होंने अंग्रेजों से लडने के लिए किया था, लेकिन उनकी लडाई में और राजनीति में हिन्दूओं का स्थान कहाँ था? था भी या नहीं?
आजाद ने किसी मदरसे या औपचारिक इस्लामी संस्थान में कभी पढाई नहीं की! यह भी आजाद के जीवन का एक विशिष्ट पहलु है कि उन्होंने अपने और अपने पूर्वजों के बडे आलिम होने की बात स्वयं और गलत प्रचारित की थी। इस हद तक की आजाद की मृत्यु के बाद स्वयं प्रधानमंत्री नेहरू को संसद में क्षमा मांगनी पडी थी कि “हमने गलती से कह दिया था कि मौलाना आजाद मिस्र के विश्व-प्रसिद्ध अल-अजहर विश्वविद्यालय में पढे थे। वस्तुतः वे वहां कभी नहीं पढे।” (‘नेहरुवाद की विरासत’, पृ. १६७)

वास्तविकता यह है कि उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई ‘इन्डिया विन्स फ्रिडम’ में आजाद ने लिखा है कि वे एक बार वहाँ घूमने गए थे!!

इस प्रकार, शिक्षा या राजनीति, किसी में भी ‘मौलाना’ आजाद की भूमिका आदर्श नहीं कही जा सकती। बहरहाल, यह व्यंग्य ही है कि इस्लाम-परस्त घोर मजहबी राजनीति करने वाले आजाद को “सेक्युलर” “शिक्षा दिवस” का प्रतिक माना जाए!

संघ को जानना जितना आसान है, समझना उतना ही मुश्किल

Standard

“संघ को जानना जितना आसान है, समझना उतना ही मुश्किल”

संघ के काम के बारें में जो दिखाया जाता है, जो बताया जाता है. वो संघ का काम नहीं है बल्कि संघ के स्वयंसेवकों का काम है.संघ का काम तो सिर्फ़ शाखा चलाना है. शाखाओं में मनुष्यों का निर्माण होता है. और यह सुनिश्चित करना कि ऐसा ही माहौल पूरे देश में निर्मित्त हो बस संघ का इतना छोटा सा काम है.
“संघ कुछ नहीं करता और स्वयंसेवक कुछ नहीं छोड़ते, सब कुछ करते है”
बस इतनी छोटी सी बात संघ 1925 से समझा रहा है. जो कुछ लोगो समझ में नहीं आता है. इसलिए संघ पर विश्वास नहीं होता. इसलिए संघ को समझने का प्रयास करना पड़ता है.
“संघ की तरह का कोई दुसरा मॉडल आज नहीं है. जिससे संघ की तुलना की जा सकें, ऐसा पूरी दुनिया में कोई दूसरा मॉडल नहीं है।”

🎯संघ को कैसे जाने ?

संघ के बारें में पढ़कर संघ को नहीं जान सकते. परम पूज्यनीय गुरूजी ने कहा था “गत 15 वर्षों से संघ का सरसंघचालक होने के नाते अब मैं धीरे धीरे संघ को समझने लगा हूँ.

🎯क्या संघ समझ से परे है ?

ऐसा भी नहीं है है. संघ को समझना आसान है और संघ को समझना मुश्किल भी है. संघ को जानने का एक ही रास्ता है. हृदय में एक सकार्त्मकता रखकर वास्तविक जिज्ञासा को लेकर, बिना किसी पूर्वाग्रह के श्रद्धा भक्ति पूर्ण तरीके से संघ को जानने का प्रयास करना. संघ का स्वयंसेवक यह साधना जीवन भर करता है. अर्थात संघ को जानने की जिज्ञासा लेकर, शुद्ध अंत:करण से जो संघ का अनुभव लेते है.धीरे धीरे उनको संघ समझ में आने लगता है. हर दिन समझ की मात्रा बढती जाती है. लेकिन अगर पूर्वाग्रह से संघ को देखेंगे तो संघ समझ में नहीं आएगा।
संघ को देखना है तो लोग स्वयंसेवक को देखते है. और साथ-साथ वो भी देखते है जो वो करता है. और कहते है यही संघ है. लेकिन जिसमें से ऐसा सोच ऐसी कर्म करनी की इच्छा विकसित होती ही. असल मायनों में वही संघ है. संघ अपने स्वयंसेवक पर विश्वास करता है. हमारे विचार के सम्पर्क में आते है, हमारे विचार से चलने वाले कामों से निकलकर गये है. संघ जानता है स्वयंसेवक सोच विचार कर जो भी करेगा वो अच्छा ही होगा।

🎯संघ विचार क्या है ?

संघ को कोई अलग से अपना विचार नहीं है. अपने देश के सभी लोगों का मिलकर जो चिन्तन बना है. संघ उसी चिंतन पर चलता है. स्वतंत्रता के पूर्व अपने देश के उत्थान के लिए, कार्य करने वाले सभी लोग का उनके अनुभव से जो निष्कर्ष था.उस निष्कर्ष को पूरा करने का का काम संघ ने उठाया. उन सभी महापुरुषों का चिन्तन था “हम देश का भाग्य परिवर्तन अपनी बुराइयां छोड़कर, अपनी अस्मिता के लिए एक साथ मिलकर हमको जीना-मरना चाहिए. और यह आदत बहुत दिनों से छूटी हुयी है. तो इनको इस आदत पर लगाने वाला एक संगठन होना चाहिए. डा. हेडगेवार जी ने यह आदत डलवाने के लिए 1925 में संघ की स्थापना की. इस संगठन का बीजारोपण 10-12 साल पहले ही डाक्टर साहब के मन में हो चुका था. 1940 तक संघ के बारें में सभी विचारधारा के बुद्धजीवियों की सहमती थी लेकिन 1940 के बाद धीरे धीरे स्वार्थ राष्ट्रीय हित से बड़ा दिखाई देने लगा।

🎯राष्ट्रीय पहचान क्यों ?

हम को आपस में जोड़ने वाली बात क्या है. हमारे यहाँ अनेक भाषाएं बोली जाती है. पंथ-संप्रदाय भी बहुत है. नास्तिक से लेकर मूर्तिपूजा तक सब हमारे यहाँ है. खान-पान, रहन-सहन वेशभूषा सभी कुछ अलग है. एक सूत्र जो हम सभी भारतीयों को आपस में जोड़े हुए है, वह है “विविधता में एकता सीखाने वाली हमारी संस्कृति”, सांसकृतिक अस्मिता के नाम पर हम एक है.
इस देश की चार दीवारी के अंदर जन्मा, पला बढ़ा हुआ कोई भी व्यक्ति, चाहे उसकी पूजा पद्दति कोई भी हो, भाषा-प्रांत कोई भी हो,राजनितिक मान्यता कोई भी हो, फिर भी उसमें कहीं न कहीं उस पर ऐसा प्रभाव दिखाई देता है. जो दुनिया के अन्य किसी भी देश में दिखाई नहीं देता. क्योंकि हमारी संस्कृति की एक अनूठी पहचान है. जब सभी एक जैसे ही है तो वह पहचान नहीं दिखती लेकिन जैसे ही हम भारत के बाहर दूसरों के बीच जाते है. “हिन्दुस्तानी””भारतीय” और हिन्दू के रूप में हमारी पहचान की जाने लगती है. भारतीय हिन्दू और आर्य संस्कृति यह तीनों परस्पर समनार्थी शब्द है.
इस देश की चार दीवारी में रहने वाले किसी भी व्यक्ति के पूर्वज बाहर से नहीं है. वो सभी भारतीय ही थे. हम सभी में एक बात सामान है. हमारी विचारधार कोई भी हो. देशभक्ति की भावना उसके ह्रदय में झंझानित जरुर करती है. भारत माता उसके ह्रदय में देशभक्ति के तारों को छेड़ती है तब उसके मुख से देशभक्तिपूर्ण उदगार निकलते है।

🎯“हिन्दू कौन है”

हिंदुत्व को लेकर भ्रम है. हिन्दू नामक कोई पथ सम्प्रदाय नही है. “सभी पथ,सम्प्रदायों का सम्मान करने वाला, उनको स्वीकार करने वाला और अपने सम्प्रदाय पर श्रद्धापूर्वक चलने वाला हिन्दू है।

🎯“हिन्दू संगठन क्यों”

मानव स्वभाव है परिक्षा में या जीन्दगी में जो आसान चुनौतियां है. उनको पहले हल किया जाता है. मुश्किल सवाल बाद में किये जाते है. इसलिए पहले जो खुद को हिन्दू कहते है. संघ उनको सगठित करके, उनका अच्छा जीवन खड़ा कर रहा है.
एक बार एक पत्रकार ने पूज्यनीय गुरु जी से प्रश्न पूंछा “मेरे गाँव में एक भी ईसाई या मुसलमान नहीं है.” तो मेरे गाँव में संघ की शाखा का क्या औचित्य? गुरु जी ने विनम्रता पूर्वक कहा “भले आदमी ! तुम्हारा गाँव क्या दुनिया में भी कोइ मुसलमान या इसाई न होता और हिन्दू समाज इस हालत में होता तो भी हम संघ का काम करते. संघ का काम किसी के विरोध में नहीं है बल्कि संघ का काम हिन्दू हित है.
इसलिए अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए नहीं, मुसलमानों के भय से नहीं, ईसाई मतांतरण करवाते है इसलिए नहीं, बल्कि हिन्दू समाज के उत्थान के लिए, भारत माता के हितों की रक्षा का दायित्व हिन्दुओं का है. इसलिए हिन्दुओं को संगठित कर, शक्ति-सामर्थ्य से युक्त करना संघ का कार्य है.
समस्या बाकी लोग नहीं है. समस्या सही विचार को काल और संगत के लिए उपयुक्त सही आचरण से न बता पाना है. पहले हम अपनी कमियों को ठीक करें. फिर सभी को संगठित करे. एक बार संगठित हो गये बस फिर सब होगा।

🎯संघ की पद्दति

पहले अपने आपको ठीक करों. एक उदाहरण बनो दूसरों के लिए. मनुष्य जीवन स्वार्थ के लिए नहीं परोपकार के लिए मिला है. पहले इसका व्यय राष्ट्रीय भावना के लिए करो फिर अंतर्राष्ट्रीय बंधुत्व की बातें करना. अपने पड़ोसियों के दुःख दर्द में शामिल न हो और भाषण दो विश्व बंधुत्व के. इस तरह “त्याग और सेवा” जैसे गुणों से युक्त मनुष्य का निर्माण करने वाली प्रयोगशाला का नाम “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” है।

1940 के बाद, संघ का स्वरुप देखकर राजनीतिक सत्ता का सिंहासन डोलने लगा. और संघ के खिलाफ दुष्प्रचार किया जाने लगा. मगर स्वयंसेवकों की दिन रात की कठिन तपस्या के कारण, एक दशक बाद ही वो कालखंड आया. जब प्रधानमंत्री ने अन्य नेताओं के साथ माननीय संघ चालक को विचार विनमेय के लिए बुलाया. 26 जनवरी की परेड में आर.एस.एस. की वाहिनी को शामिल किया गया. इसके बाद संघ के स्वयंसेवकों ने एक से बढ़कर एक प्रकल्पों में बढ़चढ़कर हिसा लेना आरम्भ कर दिया. शीघ्र ही हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा और अनुशासन की वजह से स्वयंसेवकोंने अपने झंडे गाड़ लिए. आपातकाल ने संघ के महत्व को पुन: समझाया. आर.एस.एस. के प्रचार तंत्र से देश ने प्रजातंत्र की रक्षा की. तब संघ को देखने की समाज की नज़र बदल गयी थी. यह सब कैसे हुआ. “संघ का विचार सत्य विचार है, अधिष्ठान शुद्ध है पवित्र है. इस शक्ति से ही संघ हर मुश्किल का सामना कर रहा है. इन विचारों को व्यवहार में लाने वाली कार्यपद्दति को तैयार करने का काम, संघ शाखाओं के माध्यम से कर रहा है. बाकी सब बंद हो सकता है. संघ की शाखा कभी बंद नहीं होगी।

🎯संघ का उद्देश्य

सम्पूर्ण दुनिया को सुखी-सम्पन्न वैभव पूर्ण बनाना है. और इसके लिए भारत वर्ष को परम वैभव सम्पन्न होना अति-आवश्यक है. संघ को जानना है तो घर के पास की किसी संघ की शाखा में आइये. संघ को जानने का हर कोई दुसरा मार्ग नहीं है।

पाककला जो लुप्त हो गई

Standard

#पाककला_जो_लुप्त_हो_गई

हमने आधुनिकता , प्रगतिशीलता के नाम पर अपनी विज्ञान सम्मत व आरोग्य दायिनी, आरोग्यवर्धिनी पाककला शैली को तिलांजलि दे दी है…. अब मिट्टी के बर्तनों में ना ही खाना पकता है ना ही भोजन परोसा जाता है ऐसा लगता है मानो मिट्टी के बर्तनों का प्रचलन हजारों वर्ष पूर्व की बात हो जबकि हमारे पड़ोसी देशों श्रीलंका, नेपाल यहां तक कि चीन में मिट्टी के बर्तनों में भोजन पकाने परोसने का व्यापक प्रचलन है | मिट्टी के बर्तनों का लाभ सभी को मालूम है इनमें खाना देर तक ताजा बना रहता है खाना पौष्टिक व स्वादिष्ट रहता है #पोषक_तत्व नष्ट नहीं होते मिट्टी के बर्तन #नेचुरल_फूड #प्रिजर्वेटिव का भी काम करते हैं |साग, दाल आदि धीमी स्थिर आंच पर भली-भांति बिना #माइक्रोन्यूट्रिएंट्स नष्ट किए पकता हैं लेकिन लाभ जानते हुए भी कोई मिट्टी के बर्तनों को नहीं अपना रहा है सिर्फ खूबियों का सतही तौर पर बखान करने में हम लगे रहते हैं | बताना चाहूंगा कि मिट्टी के बर्तनों का उपयोग एलपीजी #गैस_स्टोव ,#बर्नर आदि पर भी किया जा सकता है थोड़ी सी सावधानी के साथ बर्तन को एकदम तेज आंच पर ना रखें धीमी से 10 मिनट के दौरान मध्यम आंच पर पर गैस स्टोव को सेट करें गर्म, बर्तन को ठंडी सतह पर एकदम ना रखें ना ही गरम मिट्टी के बर्तन को ठंडे जल से धोए यह कुछ एक सावधानियां…. आओ फिर से मिट्टी के बर्तनों को अपनाएं!

बथुवा

Standard

बथुवा को अंग्रेजी में Lamb’s Quarters कहते है, इसका वैज्ञानिक नाम Chenopodium album है।

साग और रायता बना कर बथुवा अनादि काल से खाया जाता रहा है लेकिन क्या आपको पता है कि विश्व की सबसे पुरानी महल बनाने की पुस्तक शिल्प शास्त्र में लिखा है कि *हमारे बुजुर्ग अपने घरों को हरा रंग करने के लिए प्लस्तर में बथुवा मिलाते थे* और हमारी बुढ़ियां *सिर से ढेरे व फांस (डैंड्रफ) साफ करने के लिए बथुवै के पानी से बाल धोया करती।* बथुवा गुणों की खान है और *भारत में ऐसी ऐसी जड़ी बूटियां हैं तभी तो मेरा भारत महान है।*

बथुवै में क्या क्या है?? मतलब कौन कौन से विटामिन और मिनरल्स??

तो सुने, बथुवे में क्या नहीं है?? *बथुवा विटामिन B1, B2, B3, B5, B6, B9 और विटामिन C से भरपूर है तथा बथुवे में कैल्शियम, लोहा, मैग्नीशियम, मैगनीज, फास्फोरस, पोटाशियम, सोडियम व जिंक आदि मिनरल्स हैं। 100 ग्राम कच्चे बथुवे यानि पत्तों में 7.3 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 4.2 ग्राम प्रोटीन व 4 ग्राम पोषक रेशे होते हैं। कुल मिलाकर 43 Kcal होती है।*

जब बथुवा शीत (मट्ठा, लस्सी) या दही में मिला दिया जाता है तो *यह किसी भी मांसाहार से ज्यादा प्रोटीन वाला व किसी भी अन्य खाद्य पदार्थ से ज्यादा सुपाच्य व पौष्टिक आहार बन जाता है* और साथ में बाजरे या मक्का की रोटी, मक्खन व गुड़ की डळी हो तो इस खाने के लिए देवता भी तरसते हैं।

जब हम बीमार होते हैं तो आजकल डॉक्टर सबसे पहले विटामिन की गोली ही खाने की सलाह देते हैं ना??? गर्भवती महिला को खासतौर पर विटामिन बी, सी व लोहे की गोली बताई जाती है और बथुवे में वो सबकुछ है ही, कहने का मतलब है कि *बथुवा पहलवानो से लेकर गर्भवती महिलाओं तक, बच्चों से लेकर बूढों तक, सबके लिए अमृत समान है।*

यह साग प्रतिदिन खाने से गुर्दों में पथरी नहीं होती। बथुआ आमाशय को बलवान बनाता है, गर्मी से बढ़े हुए यकृत को ठीक करता है। बथुए के साग का सही मात्रा में सेवन किया जाए तो निरोग रहने के लिए सबसे उत्तम औषधि है। बथुए का सेवन कम से कम मसाले डालकर करें। नमक न मिलाएँ तो अच्छा है, यदि स्वाद के लिए मिलाना पड़े तो काला नमक मिलाएँ और देशी गाय के घी से छौंक लगाएँ। बथुए का उबाला हुआ पानी अच्छा लगता है तथा दही में बनाया हुआ रायता स्वादिष्ट होता है। किसी भी तरह बथुआ नित्य सेवन करें। *बथुवै में जिंक होता है जो

वैदिक काल मे विशिष्ट अतिथियो के लिए गोमांस/बैल का परोसा जाना सम्मान सूचक माना जाता था ?

Standard

शंका –

वैदिक काल मे विशिष्ट अतिथियो के लिए गोमांस/बैल का परोसा जाना सम्मान सूचक माना जाता था।
कक्षा 6-पुस्तक -प्राचीन भारत
लेखिका- #रोमिला_थापर

समाधान

ऋग्वेद के मंत्र 10 /68 /3 में अतिथिनीर्गा: का अर्थ अतिथियों के लिए गौए किया गया हैं जिसका तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के आने पर गौ को मारकर उसके मांस से उसे तृप्त किया जाता था।यहाँ पर जो भ्रम हुआ है उसका मुख्य कारण अतिथिनी शब्द को समझने कि गलती के कारण हुआ है। यहाँ पर उचित अर्थ बनता है ऐसी गौएं जो अतिथियों के पास दानार्थ लाई जायें, उन्हें दान कि जायें। Monier Williams ने भी अपनी संस्कृत इंग्लिश शब्दकोश में अतिथिग्व का अर्थ “To whom guests should go ” (P.14) अर्थात जिसके पास अतिथि प्रेम वश जायें ऐसा किया है। श्री Bloomfield ने भी इसका अर्थ “Presenting cows to guests” अर्थात अतिथियों को गौएं भेंट करनेवाला ही किया है। अतिथि को गौ मांस परोसना कपोलकल्पित है।इस भ्रान्ति का कारण मैकडोनाल्ड (वैदिक माइथोलॉजी पृष्ठ 145 ) एवं कीथ (दी रिलिजन एंड दी फिलोसोफी ऑफ़ दी वेदास एंड उपनिषदस ) द्वारा अतिथिग्व शब्द का अर्थ अतिथियों के लिए गोवध करना बताया जाना हैं जिसका समर्थन काणे (हिस्ट्री ऑफ़ धर्म शास्त्र भाग 2 पृष्ठ 749-56 ) ने भी किया है।

यह भी एक भ्रान्ति है कि वेदों में बैल को खाने का आदेश है। वेदों में जैसे गौ के लिए अघन्या अर्थात न मारने योग्य शब्द का प्रयोग है उसी प्रकार से बैल के लिए अघ्न्य शब्द का प्रयोग है। यजुर्वेद 12/73 में अघन्या शब्द का प्रयोग बैल के लिए हुआ है। इसकी पुष्टि सायणाचार्य ने काण्वसंहिता में भी कि है।

इसी प्रकार से अथर्ववेद 9/4/17 में लिखा है कि बैल सींगों से अपनी रक्षा स्वयं करता है, परन्तु मानव समाज को भी उसकी रक्षा में भाग लेना चाहिए।

अथर्ववेद 9/4/19 मंत्र में बैल के लिए अधन्य और गौ के लिए अधन्या शब्दों का वर्णन मिलता है। यहाँ पर लिखा है कि ब्राह्मणों को ऋषभ (बैल) का दान करके यह दाता अपने को स्वार्थ त्याग द्वारा श्रेष्ठ बनाता है। वह अपनी गोशाला में बैलों और गौओं कि पुष्टि देखता है।

अथर्ववेद 9/4/20 मंत्र में जो सत्पात्र में वृषभ (बैल) का दान करता है उसकी गौएं संतान आदि उत्तम रहती है।