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छत्रसाल

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औरंगजेब की हर चाल को परास्त किया छत्रसाल

छत्रसाल जैसे हिंदू वीरों के प्रयासों को अतार्किक, अयुक्तियुक्त, असमसामयिक और निरर्थक सिद्घ करने के लिए धर्मनिरपेक्षतावादी/ साम्यवादी इतिहास लेखकों ने एड़ी-चोटी का बल लगाया है। इन लोगों ने शाहजहां को ही नही, अपितु औरंगजेब को भी धर्मनिरपेक्ष शासक सिद्घ करने का प्रयास किया है। जबकि वास्तव में ऐसा नही था। डा. वी.ए. स्मिथ ने कहा है कि-”शाहजहां धार्मिक दृष्टि से एक कट्टर मुसलमान तथा धर्मांध शासक था। हिंदुओं पर उसने कठोर नियंत्रण लगाये। नये मंदिर बनाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया। प्रयाग एवं बनारस में उसने 76 हिंदू मंदिरों को गिरवा दिया था।”

हिन्दू राज्य की स्थापना के लिए संघर्ष करते रहे हिन्दू वीर

(संदर्भ : ‘दा ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ पृष्ठ 397)

इतिहासकारों का कहना है कि उसने हिंदुओं पर पुन: तीर्थ यात्रा कर लगाया। उसने हिंदुओं को बलात मुसलमान बनाने की प्रक्रिया को भी प्रोत्साहन दिया। इतना ही नही वह शिया मुस्लिमों के प्रति भी कठोर था। अनेक शियाओं को उसकी कठोरता का शिकार होना पड़ा था। उसकी दक्षिण नीति उसकी धार्मिक कट्टरता तथा धार्मिक असहिष्णुता की नीति थी।

डा. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव कहते हैं-”यह ठीक है कि उसके शासन काल में प्रतिक्रियावादी भारत के बीज बोये जा चुके थे, जो फलस्वरूप मुगलवंश तथा साम्राज्य के पतन के मूल कारण थे। उसकी धार्मिक कट्टरता तथा असहिष्णुता ने ही औरंगजेबी प्रतिक्रियावादी शासन पद्घति को जन्म दिया।”

(संदर्भ : ‘भारत का इतिहास’ पृष्ठ 703)

शाहजहां के शासन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बनारसीदास सक्सेना ने कहा है कि उसके शासन काल में ”प्रांतीय शासक प्राय: स्वतंत्र हो गये।” कथित स्वर्ण-युग के निर्माता इस शासक के शासनकाल में एक बार अकाल पड़ गया था तो उस समय लोगों की जो स्थिति हुई थी उस पर इतिहासकार मूरलैंड ने लिखा है कि जब लोग भूखे मर रहे थे। उस समय शाहजहां के शिविर में हर प्रकार की रसद पड़ी थी।

मुण्डी ने लिखा है कि- ”जहां तक मैंने देखा दुखी लोगों की सहायतार्थ सरकार द्वारा कुछ भी नही किया गया।”

अब्दुल हमीद लाहौरी ने इस अकाल का आंखों देखा वर्णन करते हुए लिखा है-”एक-एक रोटी के लिए लोग अपना जीवन बेचने को तत्पर थे। पर कोई भी व्यक्ति उन लोगों को खरीदने के लिए उत्सुक नही था बाजारों में बकरे के मांस के स्थान पर कुत्ते का मांस बिकता था और मरे हुए व्यक्तियों की हड्डियों को पीस कर आटे में मिलाकर लोग बेचते थे।”

छत्रसाल इसी अवस्था से भारत की मुक्ति चाहते थे

शाहजहां के कुशासन की प्रतिक्रिया स्वरूप छत्रसाल का जन्म हुआ। जब उस महायोद्घा ने देखा कि लोग एक रोटी के लिए भी अपना जीवन बेच देना चाहते है, तो यह कैसे कहा जा सकता है कि छत्रसाल जैसे देशभक्तों के हृदयों में आग न लगी हो? आग लगी, और इतनी तेज लगी कि संपूर्ण तंत्र को ही भस्मीभूत करने के लिए प्रचण्ड हो उठी।

इसी तेज पुंज छत्रसाल को राजा सुजानसिंह की मृत्यु के उपरांत उसके भाई इंद्रमणि ने ओरछा की गद्दी संभालने के पश्चात 1674-1676 के मध्य अपनी सहायता देना बंद कर दिया, तो इस शासक के बहुत बड़े क्षेत्र को जीतकर छत्रसाल ने अपने राज्य में मिला लिया। तब इंद्रमणि पर छत्रसाल ने अपना शिकंजा कसना आरंभ किया तो वह भयभीत हो गया और उसने शीघ्र ही छत्रसाल के साथ संधि कर ली। उसने छत्रसाल को मुगलों के विरूद्घ सहायता देने का भी वचन दिया।

तहवर खां को किया परास्त

1679 ई. में औरंगजेब ने अपने चिरशत्रु शत्रुसाल (छत्रसाल) का मान मर्दन करने के लिए अपने बहुत ही विश्वसनीय योद्घा तहवर खां को विशाल सेना के साथ भेजा। छत्रसाल इस समय संडवा बाजने में अपनी स्वयं की वर यात्रा लेकर आये हुए थे। उस समय उनकी भंवरी पड़ रही थी, तो तहवर खां ने उसी समय उन्हें घेर लिया। छत्रसाल के विश्वसनीय साथी बलदीवान ने तहवर खां से टक्कर ली। भंवरी पड़ चुकने पर छत्रसाल ने तहवरखां की सेना के पृष्ठ भाग पर आक्रमण कर दिया और जब तक तहवरखां इस सच से परिचित होता कि उसकी सेना के पृृष्ठ भाग पर मार करने वाला योद्घा ही छत्रसाल है, तब तक छत्रसाल ने तहवरखां को भारी क्षति पहुंचा दी थी।

जब तहवरखां अपनी सेना के पृष्ठ भाग की रक्षार्थ उस ओर चला तो बलदीवान भी उसके पीछे-पीछे चल दिया। रामनगर की सीमा में छत्रसाल की सेना से तहवरखां का सामना हो गया। अब सामने से छत्रसाल की सेना और पीछे से बल दीवान की सेना ने तहवरखां की सेना को मारना आरंभ कर दिया। अंत में तहवरखां वीरगढ़ की मुगल सैनिक चौकी की ओर भाग लिया। पर यह क्या? उसे तो छत्रसाल के सैनिक पहले ही नष्ट कर चुके थे। अब तो वह और भी कठिनाई में फंस गया। वीरगढ़ में उसे ऐसा लगा कि छत्रसाल की सेना मुगलों के भय से भागती फिर रही है तो उसने छत्रसाल का पीछा करना चाहा। उसे सूचना मिली कि छत्रसाल टोकरी की पहाड़ी पर छुपा है। तब वह उसी ओर चल दिया। उधर बलदीवान वीरगढ़ के पास छिपा सारी वस्तुस्थिति पर दृष्टि गढ़ाये बैठा था, उसे जैसे ही ज्ञात हुआ कि तहवरखां टोकरी की ओर बढ़ रहा है तो वह भी तुरंत उसी ओर चल दिया। छत्रसाल और बलदीवान शत्रु को इसी पहाड़ी पर ले आना चाहते थे क्योंकि यहां शत्रु को निर्णायक रूप से परास्त किया जा सकता था।

यहां से बलदीवान ने एक सैनिक टुकड़ी छत्रसाल की सहायतार्थ भेजी। उसने स्वयं ने मुगलों को ऊपर न चढऩे देने के लिए उनसे संघर्ष आरंभ कर दिया। यहां पर छत्रसाल की सेना के हरिकृष्ण मिश्र नंदन छीपी और कृपाराम जैसे कई वीरों ने अपना बलिदान दिया। पर उनका यह बलिदान व्यर्थ नही गया-कुछ ही समयोपरांत मुगल सेना भागने लगी। हमीरपुर के पास उस सेना का सामना छत्रसाल से हुआ तो तहवरखां को निर्णायक रूप से परास्त कर दिया गया। तहवरखां को अपने स्वामी औरंगजेब को मुंह दिखाने का भी साहस नही हुआ।

कालिंजर विजय

मुगल सत्ता व शासकों के पापों का प्रतिशोध लेता छत्रसाल अपनी नवविवाहिता पत्नी के साथ कालिंजर की ओर बढ़ा तो वहां के दुर्ग के मुगल दुर्ग रक्षक करम इलाही के हाथ पांव फूल गये। कालिंजर का दुर्ग बहुत महत्वपूर्ण था। छत्रसाल ने 18 दिन के घेराव और संघर्ष के पश्चात अंत में इसे भी अपने अधिकार में ले ही लिया। दुर्ग पर छत्रसाल का भगवाध्वज फहर गया। इस युद्घ में बहुत से बुंदेले वीरों का बलिदान हुआ, पर उस बात की चिंता किसी को नही थी।

कालिंजर विजय की प्रसन्नता में बलिदान सार्थक हो उठे। सभी ने अपने वीरगति प्राप्त साथियों के बलिदानों को नमन किया और उनके द्वारा दिखाये गये मार्ग पर चलने की प्रतिज्ञा भी की। यहीं से छत्रसाल को लोगों ने ‘महाराजा’ कहना आरंभ किया। ये कालिंजर की महत्ता का ही प्रमाण है कि लोग अब छत्रसाल को ‘महाराजा’ कहने में गौरव अनुभव करने लगे। छत्रसाल महाराजा के इस सफल प्रयास से मुगल सत्ता को उस समय कितनी ठेस पहुंची होगी?-यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

छत्रसाल को घेरने की तैयारी होने लगी

अब छत्रसाल की ख्याति इतनी बढ़ चुकी थी कि उनसे ईष्र्या करने वाले या शत्रुता मानने वाले मुगल शासकों तथा उनके चाटुकार देशद्रोही ‘जयचंदों’ ने उन्हें घेरने का प्रयास करना आरंभ कर दिया। औरंगजेब के लिए यह अत्यंत लज्जाजनक स्थिति थी कि छत्रसाल जैसा एक युवक उसी की सेना से निकलकर उसी के सामने छाती तानकर खड़ा हो जाए और मिट्टी में से रातों रात एक साम्राज्य खड़ा करने में सफल हो जाए। विशेषत: तब जबकि यह साम्राज्य उसी के साम्राज्य को छिन्न-भिन्न करके तैयार किया जा रहा था।

छत्रसाल ने भी स्थिति को समझ लिया था। डा. भगवानदास गुप्त ‘महाराजा छत्रसाल बुंदेला’ में लिखते हैं कि-”छत्रसाल ने ऐसी परिस्थितियों में दूरदृष्टि का परिचय देते हुए औरंगजेब के पास अपने कार्यों की क्षमायाचना का एक पत्र लिखा। वास्तव में यह पत्र उन्होंने मुगलों को धोखे में डालने के लिए नाटकमात्र किया था। जिससे मुगल कुछ समय के लिए भ्रांति में रह जाएं और उन्हें अपनी तैयारियां करने का अवसर मिल जाए। क्योंकि छत्रसाल यह जान गये थे कि अब जो भी युद्घ होगा वह बड़े स्तर पर होगा। बुंदेलखण्ड की मिट्टी में रहकर किसी के लिए यह संभव ही नही था कि वह वहां स्वतंत्रता के विरूद्घ आचरण करे। इस मिट्टी में स्वतंत्रता की गंध आती थी और उस सौंधी सौंधी गंध को पाकर लोग वीरता के रस से भर जाते थे। छत्रसाल के साथ भी ऐसा ही होता था।”

स्वामी प्राणनाथ और छत्रसाल

स्वामी प्राणनाथ छत्रसाल के आध्यात्मिक गुरू थे-उन्होंने अपने प्रिय शिष्य के भीतर व्याप्त स्वतंत्रता और स्वराज्य के अमिट संस्कारों को और भी प्रखर कर दिया और उन्हें गतिशील बनाकर इस प्रकार सक्रिय किया कि संपूर्ण बुंदेलखण्ड ही नही, अपितु तत्कालीन हिंदू समाज भी उनसे प्राण ऊर्जा प्राप्त करने लगा। स्वामी प्राणनाथ और छत्रसाल का संबंध वैसा ही बन गया जैसा कि छत्रपति शिवाजी महाराज और समर्थ गुरू रामदास का संबंध था। स्वामी प्राणनाथ का उस समय हिन्दू समाज में अच्छा सम्मान था।

साम्राज्य निर्माता छत्रसाल

इसके पश्चात छत्रसाल ने जलालखां नामक एक सरदार का सामना किया और उसे बेतवा के समीप परास्त कर उससे 100 अरबी घोड़े, 70 ऊंट तथा 13 तोपें प्राप्त कीं। इसी प्रकार जब औरंगजेब द्वारा बारह हजार घुड़सवारों की सेना अनवर खां के नेतृत्व में 1679 ई. में भेजी गयी तो उसे भी छत्रसाल ने परास्त कर दिया।

इस प्रकार की अनेकों विजयों से तत्कालीन भारत के राजनीतिक गगन मंडल पर छत्रसाल ने जिस वीरता और साहस के साथ अपना साम्राज्य खड़ा किया उसने उनके नाम को इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर सदा-सदा के लिए अमर कर दिया। उनका पुरूषार्थ भारत के इतिहास के पृष्ठों को उनकी कान्ति से इस प्रकार महिमामंडित और गौरवान्वित कर गया कि लोग आज तक उन्हें सम्मान के साथ स्मरण करते हैं। उसका प्रयास हिंदू राष्ट्र निर्माण की दिशा में उठाया गया ठोस और महत्वपूर्ण कार्य था। दुर्भाग्य हमारा था कि हम ऐसे प्रयासों को निरंतर पीढ़ी दर पीढ़ी केवल इसीलिए अनवरतता या नैरतंर्य प्रदान नही कर पाये कि छत्रसाल जैसे राष्ट्रनिर्माताओं के चले जाने पर हमारे भीतर से ही कुछ ‘जयचंद’ उठते थे और उनके प्रयासों को धक्का देने के लिए सचेष्ट हो उठते थे।

यह सच है कि अपने काल के बड़े-बड़े शत्रुओं को समाप्त करना और महादुष्ट और निर्मम शासकों की नाक तले साम्राज्य खड़ा कर राष्ट्र निर्माण का कार्य संपन्न करना बहुत बड़ा कार्य था। जिसे शत्रु के अत्याचारों से मुक्त होने की दिशा में उठाया गया वंदनीय कृत्य ही माना जाना चाहिए।

औरंगजेब की नींद उड़ा दी थी छत्रसाल ने

औरंगजेब की रातों की नींद छत्रसाल के कारण उड़ चुकी थी। वह जितने प्रयास करता था कि छत्रसाल का अंत कर दिया जाए-छत्रसाल था कि उतना ही बलशाली होकर उभरता था।

शिवाजी की मृत्यु के उपरांत 14 अप्रैल 1680 ई. में औरंगजेब ने मिर्जा सदरूद्दीन (धमौनी का सूबेदार) को छत्रसाल को बंदी बनाने के लिए भेजा। छत्रसाल इस समय अपने गुरू छत्रपति शिवाजी की मृत्यु (4 अप्रैल 1680 ई.) से आहत थे। पर वह तलवार हाथ में लेकर युद्घ के लिए सूचना मिलते ही चल दिये।

चिल्गा नौरंगाबाद (महोबा राठ के बीच) में दोनों पक्षों का आमना-सामना हो गया। छत्रसाल ने सदरूद्दीन की सेना के अग्रिम भाग पर इतनी तीव्रता से प्रहार किया कि वह जितनी शीघ्रता से आगे बढ़ रही थी उतनी ही शीघ्रता से पीछे भागने लगी। इससे सदरूद्दीन की सेना में खलबली मच गयी। सदरूद्दीन भी छत्रसाल की सेना के आक्रमण से संभल नही पाया और ना ही वह अपने भागते सैनिकों को कुछ समझा पाया कि भागिये मत, रूकिये और शत्रु का सामना वीरता से कीजिए। उसको स्वयं को भी भय लगने लगा।

सदरूद्दीन को भी पराजित होना पड़ा

इस युद्घ में परशुराम सोलंकी जैसे अनेकों हिंदू वीरों ने अपनी अप्रतिम वीरता का प्रदर्शन किया और मुगल सेना को भागने के लिए विवश कर दिया। पर सदरूद्दीन ने अपनी सेना को ललकारा और उसे कुछ समय पश्चात वह रोकने में सफल रहा। फिर युद्घ आरंभ हुआ। इस बार बुंदेले वीर छत्रसाल को मुगल सेना ने घेर लिया। पर वह वीर अपनी तलवार से शत्रु को काटता हुआ धीरे-धीरे पीछे हटता गया। वह बड़ी सावधानी से और योजनाबद्घ ढंग से पीछे हट रहा था और शत्रुसेना को अपने साथी परशुराम सोलंकी की सेना की जद में ले आने में सफल हो गया, जो पहले से ही छिपी बैठी थी। यद्यपि मुगल सैनिक छत्रसाल के पीछे हटने को ये मान बैठे थे कि वह अब हारने ही वाली है।

परशुराम के सैनिक भूखे शेर की भांति मुगलों पर टूट पड़े। युद्घ का परिदृश्य ही बदल गया , सदरूद्दीन को अब हिंदू वीरों की वीरता के साक्षात दर्शन होने लगे। वीर बुंदेले अपना बलिदान दे रहे थे और बड़ी संख्या में शत्रु के शीश उतार-उतार कर मातृभूमि के ऋण से उऋण हो रहे थे। परशुराम सोलंकी, नारायणदास, अजीतराय, बालकृष्ण, गंगाराम चौबे आदि हिंदू योद्घाओं ने मुगल सेना को काट-काटकर धरती पर शवों का ढेर लगा दिया। अपनी पराजय को आसन्न देख सदरूद्दीन मियां ने अपने हाथी से उतरकर एक घोड़े पर सवार होकर भागने का प्रयास किया। जिसे छत्रसाल ने देख लिया। वह तुरंत उस ओर लपके और सदरूद्दीन को आगे जाकर घेर लिया। सदरूद्दीन के बहुत से सैनिकों ने उसका साथ दिया। छत्रसाल की सेना के नायक गरीबदास ने यहां भयंकर रक्तपात किया और अपना बलिदान दिया। पर सिर कटे गरीबदास ने भी कई मुगलों को काटकर वीरगति प्राप्त की। मुगल सेना का फौजदार बागीदास सिर विहीन गरीब दास की तलवार का ही शिकार हुआ था। गरीबदास की स्थिति को देखकर छत्रसाल और उनके साथियों ने और भी अधिक वीरता से युद्घ करना आरंभ कर दिया।

अंत में सदरूद्दीन क्षमायाचना की मुद्रा में खड़ा हो गया। उसने छत्रसाल को चौथ देने का वचन भी दिया। छत्रसाल ने तो उसे छोड़ दिया पर बादशाह औरंगजेब ने उसे भरे दरबार में बुलाकर अपमानित किया और उसके सारे पद एवं अधिकारों से उसे विहीन कर दिया।

हमीद खां को भी किया परास्त

इसी प्रकार कुछ कालोपरांत छत्रसाल को एक हमीदखां नामक मुगल सेनापति के आक्रमण की जानकारी मिली। हमीदखां ने चित्रकूट की ओर से आक्रमण किया था और वह वहां के लोगों पर अत्याचार करने लगा था। तब उस मुगल को समाप्त करने के लिए छत्रसाल ने बलदीवान को 500 सैनिकों के साथ उधर भेजा। बलदीवान ने उस शत्रु पर जाते ही प्रबल प्रहार कर दिया और उसे प्राण बचाकर भागने के लिए विवश कर दिया। बलदीवान ने हमीद खां का पीछा किया और उसके द्वारा महोबा के जागीरदार को छत्रसाल के विरूद्घ उकसाने की सूचना पाकर उस जागीरदार को भी दंडित किया। यहां से बचकर भागा हमीद खां बरहटरा में जाकर लूटमार करने लगा तो वहां छत्रसाल के परमहितैषी कुंवरसेन धंधेरे ने हमीद खां को निर्णायक रूप से परास्त कर भागने के लिए विवश कर दिया।

मुगल साम्राज्य हो गया छिन्न-भिन्न

हम यहां पर स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि औरंगजेब भारतवर्ष में ऐसा अंतिम मुस्लिम बादशाह था-जिसके साम्राज्य की सीमाएं उसके जीवनकाल में भी तेजी से सिमटती चली गयीं। उसकी मृत्यु के पश्चात उसका साम्राज्य बड़ी तेजी से छिन्न-भिन्न हो गया था, और फिर कभी उन सीमाओं तक किसी भी मुगल बादशाह को राज्य करने का अवसर नही मिला। मुगलों के साम्राज्य को इस प्रकार छिन्न-भिन्न करने में छत्रसाल जैसे महायोद्घाओं का अप्रतिम योगदान था। हमें चाहे सन 1857 तक चले मुगल वंश के शासकों के नाम गिनवाने के लिए कितना ही विवश किया जाए पर सत्य तो यही है कि औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) के पश्चात ही भारत से मुगल साम्राज्य समाप्त हो गया था। उसकी मृत्यु के पश्चात भारतीय स्वातंत्रय समर की दिशा और दशा में परिवर्तन आ गया था। जिसका उल्लेख हम यथासमय और यथास्थान करेंगे।

यहां इतना स्पष्ट कर देना समीचीन होगा कि औरंगजेब अपने जीवन में बुंदेले वीरों के पराक्रमी स्वभाव से इतना भयभीत रहा कि वह कभी स्वयं बुंदेलखण्ड आने का साहस नही कर सका। वह दूर से ही दिल्ली की रक्षा करता रहा और उसकी योजना मात्र इतनी रही कि चाहे जो कुछ हो जाए और चाहे जितने बलिदान देने पड़ जाएं पर छत्रसाल को दिल्ली से दूर बुंदेलखण्ड में ही युद्घों में उलझाये रखा जाए और उससे ‘दिल्ली दूर’ रखी जाए। औरंगजेब जैसे बादशाह की इस योजना को जितना समझा जाएगा उतना ही हम छत्रसाल की वीरता को समझने में सफल होंगे। इतिहास के अध्ययन का यह नियम है कि अपने चरित नायक को समझने के लिए आप उसके शत्रु पक्ष की चाल को समझें और देखें कि आपके चरितनायक ने उन चालों को किस प्रकार निरर्थक सिद्घ किया या उनका सामना किया या शत्रु पक्ष को दुर्बल किया? निश्चय ही हम ऐसा समझकर छत्रसाल के प्रति कृतज्ञता से भर जाएंगे।

What is NPA?

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Non performing assets

हवाई फायरिंग अपनी जगह है..चलिए कुछ समझने की कोशिश करते हैं..

सवाल : NPA क्या होता है?

जवाब : जब उधार लेने वाला ब्याज वापस देना बंद कर देता है या मूल धन या दोनों को ही वापस नहीं लौटता तो उस धन को नॉन परफार्मिंग एसेट (NPA ) कहा जाता है. भारतीय बैंकिंग सिस्टम की ये सबसे बड़ी समस्याओं में से एक हमेशा रहा है. उदाहरण के लिए समझते हैं कि मानों अजी हाँ ने अपनी डिजिटल मीडिया कंपनी खोली और बैंकों से १ करोड़ का लोन उठाया..बैंक वालों ने बोला कि भय्ये साल का १२ टका ब्याज देता रहियो..हम कमिटमेंट दे दिए..शुरू में धंधा बढ़िया चला और टाइम से हम ब्याज देते रहे..बाद में आपस की लड़ाई में..या बिजनेस इंट्रेस्ट चेंज हो जाने से..या किसी भी कारण से हम 90 दिन तक कोई ब्याज नहीं दिए..तो ऐसे में बैंक उस लोन को NPA में दिखायेगा.

NPA तीन प्रकार का होता है..

सबस्टैंडर्ड : जब १२ महीने या उस से कम समय तक कोई भी रिटर्न न आये
डाउटफुल : १२ महीने के बाद भी कोई रिटर्न न आये..
लॉस : इस केस में RBI या बैंक को पता तो चल जाता है कि लॉस है पर अमाउंट को write ऑफ़ नहीं किया जाता.

सवाल : हमारे देश में NPA का खेल क्या है?

जवाब : ब्रिक्स देशों के समूहों में हम इस मामले में सबसे फिसड्डी हैं..२०१६ के आंकलन के हिसाब से लगभग कुल लोन का १०% लोन NPA था जो लगभग ७ लाख करोड़ तक पहुँच रहा था..इसमें भी बहुत सा डाटा करेक्ट नहीं था और ज्यादातर ऑडिट और रिपोर्टिंग एजेंसी ने रिपोर्ट ग्रीन दिखाने को गलत रिपोर्ट ऊपर तक पहुंचाई गयी थी..समस्या इतनी विकराल बनती जा रही थी कि बैंकिंग सिस्टम क्रैश होने के कगार पर आ चुका था..

सवाल : इतना NPA कैसे इकठ्ठा हो गया?

जवाब : बहुत से कारण है..जैसे कुछ और करने को लोन लिया था..कुछ और करते रहे..या कभी ग्लोबल स्लोडाउन का शिकार बिजनेस हो गया..या कोई स्पेसफिक सेक्टर मंदी की चपेट में आ गया..या लोन देते में ही गड़बड़ घोटाला कर दिया गया ..या कंपनी का मैनजमेंट फुद्दू निकला..या कंपनी ने औकात से ज्यादा बड़ा एक्सपेंशन कर लिया और फिर उसे संभाल नहीं पाए.

इस सब से होता ये है कि बैंकों का प्रॉफिट मार्जिन कम होता जाता है..सरकार तक कम पैसा पहुँच पाता है..इन्वेस्टमेंट पर रिटर्न कम रहने से ग्रोथ रुक जाती है..बेरजोगारी बढ़ती है..और बैंकों को इंटरेस्ट रेट बढ़ा कर नुक्सान की भरपाई करनी होती है..

सवाल : ठीक है ठीक है ये तो ज्ञान बाजी हो गयी..ये बताओ मोदी सरकार क्या की?

जवाब : २०१५ में इस सरकार ने मिशन इंद्रधनुष लांच किया जो कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण होने के बाद सबसे बड़ा बैंकिंग रिफार्म माना जाता है..
इसके ७ प्रमुख अंग हैं :

*अपॉइंटमेंट : वैश्विक नॉर्म्स के हिसाब से सबकी अकॉउंटबिल्टी सेट करती हुई restructuring की.
*बैंक बोर्ड ब्यरो : अर्थ जगत के बुद्धिजीवियों के साथ मिलके ब्यूरो का गठन किया जो पारदर्शिता से अपॉइंटमेंट करने की जिम्मेवारी के साथ कम करेगा.
* कॅपिटलिजेशन : सरकार लगभग ७०००० करोड़ रुपया सरकारी बैंकों को देगी जिस से उनकी कार्य क्षमता को सपोर्ट मिलेगा.
*डी-स्ट्रेस्सिंग : रिस्क कंट्रोल मैकेनिज्म बनाना
* एम्प्लॉयमेंट
*एकाउंटेबिलिटी फ्रेमवर्क.
* गवर्नेंस रिफॉर्म्स

2015 का स्ट्रेटेजिक डेब्ट रिस्ट्रक्चरिंग (SDR ) – इसमें बैंकों को अधिकार दिया गया कि लोन के बदले धंधे में इक्विटी ली जा सकती है..इसमें लोन न लौटाने की स्थिति में बैंक कंपनी की ओनरशिप अपने हाथ ले सकते हैं.

2015 का ही एसेट क्वालिटी रिव्यु (ARC ) : जितने भी स्ट्रेस्ड अकाउंट हैं उनमें बड़े खिलाड़ियों का सेम्पल ऑडिट..जिस से अर्ली डिटेक्शन और बैंकों की कार्य प्रणाली पर नज़र रखी जा सके..

SSSA 2016 – इसमें बड़ी मछलियों की मिलीभगत पर नज़र रखी जा सकती है..किसको औकात से ज्यादा लोन मिल रहा है..वो उस लोन का क्या कर रहा है..किस एवज में उसको ये लोन मिला है ये सब यहां चेक पॉइंट लगा के देखा जा सकता है.

इन सबके अलावा Pubic ARC vs. Private ARC – 2017 और Bad Banks के आर्थिक सुधारों की बात भी इस साल के इकनोमिक सर्वे में सरकार ने रखी है..

इस सब को पढ़ के इतना तो समझ आता है कि चीजें कैसे चलती रहीं थी और कैसे चल रही हैं..इतनी जानकारी अगर पहले जुटा लेते तो नोटबंदी समझने के लिए एक अलग पर्सपेक्टिव भी मिलता..बैंकों का री-कैपिटलिजेशन क्यों जरूरी था ये भी समझ आता..कैसे कैसे टाइम बम इकॉनमी में लगा के रखे गए थे वो पकड़ में ही नहीं आते अगर एसेट क्वालिटी रिव्यु इस सरकार ने नहीं initiate किया होता..

सब कुछ एक दुसरे से जुड़ा हुआ प्रतीत ही होता है…बैंकिंग कोलैप्स होती तो ब्याज दरें कहाँ जाती..मंहगाई का क्या हाल होता..बिजनेस एनवायरनमेंट पे क्या असर पड़ता..ये सब integrate करके सोचा जा सकता है…इतना डिटेल में लिखने के लिए डिटेल में पढ़ना भी पड़ा है..और पढ़ के ये समझ आया..कि outrage बहुत आसान है..एक लाइन का जोक मारना बहुत आसान है..लेकिन जो चेलेंज मोदी फेस कर रहा है जो लड़ाई वो लड़ रहा है वो इस देश की लड़ाई है.

आप भी पढ़िए और अपनी इंडिपेंडेंट सोच बनाइये..सरकारें आती जाती रहेंगी..ये देश यहीं रहेगा..हमारी और आपकी पीढ़ियां यहीं रहेंगी..हम उनको कैसा भारत देना चाहेंगे ये तो हमारे ही हाथ में हैं.

Congress equal to scam

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भारत में इटालियन गिरोह और उसके प्यादों ने भारत को कैसे कैसे अर्थशास्त्री दिए थे और उन्होंने भारत को किस बुरी तरह खोखला किया था .उस पर 10 August 2012 को लिखा मेरा एक लेख

ये घटना मीडिया आपको कभी नहीं बताएगी ……….

मनमोहन सिंह के बारे में कुछ अनकहे अनसुने तथ्य ……….!!!

कुछ दिन पहले मनमोहन सिंह ने भारतीय सैनिको की आत्महत्या पर संसद में बयान दिया था कि ” ऐसे छोटे मोटे हादसों का जिक्र संसद में ना किया करे ”.

मनमोहन के उस बयान के बाद मेरे मन में सबाल उठा की आखिर देश के प्रधानमंत्री के पद पर बैठा इंसान अपने देश की सेनाओं के बारे में इतना संवेदनहीन कैसे हो सक्ता है … इसके बाद ये विचार आया की इंसान संबेदनशील और खुश किसके प्रति होता है … फिर ध्यान गया की इंसान कौन कौन सी गुलामी का शिकार हो सक्ता है .. तब विचार आया की गुलामी दो प्रकार की होती है ..एक . मानसिक गुलामी …दूसरी अहसानो में दब कर की जाने बाली गुलामी …..!!!

इस फोटो को देखे आपने ऐसी मनमोहक मुस्कान शायद ही किसी और चित्र या मौके पर इन सज्जन के चेहरे देखी होगी …………इस चित्र में मनमोहन उस इंसान के साथ है जिसके देश से मनमोहन ने अपने जीवन का असली सफर शुरू किया ………. भारत में उनके सफर के साथियो के साथ उनकी मुस्कान भरी फोटो तो आप ने अवश्य देखी ही होगी होगी …

घटनाक्रम है इंदिरा गांधी द्वारा देश में लगाए गए आपातकाल (Emergency ) का ..उस समय भारत की रिजर्व बैक का पदेन निदेशक था मनमोहन सिंह नाम का एक नौकरशाह ……..बर्ष 1977 जनतापार्टी की मोरारजी देसाई सरकार में एच ऍम पटेल देश के वित्तमंत्री थे और डाक्टर इन्द्रप्रसाद गोवर्धन भाई पटेल रिजर्ब बैंक आफ इण्डिया के गवर्नर …. उसी समय बैक आफ क्रेडिट एंड कामर्स इंटरनेशनल जिसका अध्यक्ष एक पाकिस्तानी था .. ने भारत में अपनी व्यावसायिक शाखा खोलने के लिये आवेदन दिया ….जब रिजर्व बैक आफ इण्डिया ने उसके आवेदन की जांच की तो पता चला की ये पाकिस्तानी बैंक काले धन को विदेशी बैंको में भेजने का काम करता है जिसे मनी लांड्रिंग कहते है इसलिए इसको अनुमति नहीं दी गयी ………..इस वीच रिजर्व बैक के गवर्नर आई जी पटेल को प्रलोभन मिला की अगर बो इस बैक को अनुमति देने में सहयोग करते है तो उनके ससुर और प्रख्यात अर्थशास्त्री ए.के.दासगुप्ता के सम्मान में एक अंतराष्ट्रीय स्तर की संस्था खोली जायेगी ..पर ईमानदार गवर्नर उस प्रलोभन में नहीं फंसे …इस वीच आई जी पटेल की सेवानिवृत्ति का समय पास आ चुका था अंतिम दिनों में उनको पाकिस्तानी बैंक BCCI के मुम्बई प्रतिनिधि कार्यालय से एक फोन आया जिसमें उनसे निवेदन किया गया की बो BCCI के अध्यक्ष आगा हसन अबेदी से एक बार मुलाक़ात कर ले … RBI के गवर्नर ने इसकी अनुमति दी लेकिन मुलाक़ात से एक दिन पहले उनके पास फोन आया की अब मुलाक़ात की कोई जरुरत नहीं है क्यों की जो काम मुंबई में होना था अब दो दिल्ली में हो चुका है .. साथ ही उनको बताया गया की बो जल्दी ही सेवानिवृत्त होने बाले है …..!
समय 23-06-1980 के बाद का इंदिरा गाँधी के पुत्र संजीव गाँधी उर्फ संजय गांधी की म्रत्यु से खाली हुए शक्ति केंद्र पर राजीव गाँधी की पत्नी का कब्ज़ा … उस समूह में शामिल थे बी. के नेहरु जिन्हें पाकिस्तानी बैंक BCCI ने पहले से ही सम्मानित कर रक्खा था ………….!!
काल खंड 15-09-1982… भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर आई जी पटेल सेवानिवृत ..एक दिन बाद मनमोहन सिंह भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर बने …..

काल खंड 14-01-1980 इंदिरा गाँधी फिर से देश की प्रधानमंत्री बनी केंद्रीय सत्ता के अज्ञात और अनाम समूह ने पाकिस्तानी बैंक BCCI के अध्यक्ष आगा हसन अबेदी को विश्वास दिलाया की मनमोहन सिंह ही भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर बनेगे शायद इसीलिये अध्यक्ष आगा हसन अबेदी ने आई जी पटेल से मुम्बई में अपनी मुलाक़ात केंसिल की थी ….!
कालखंड सन 1983 …..भारतीय गुप्तचर एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस बिंग के बिरोध के बाबजूद पाकिस्तानी बैंक BCCI को मुम्बई में पूर्ण व्यावसायिक शाखा खोलने की अनुमति मिली जिसका मुख्यालय लंदन में ………….! पाकिस्तानी मूल के नागरिक आगा हसन अबेदी की भारत के बित्त मंत्रालय में घुसपैठ का अंदाज इस बात से लगाए की उसको पहले ही सूचना मिल गयी की मनमोहन ही भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर होगे … इस वीच मनमोहन की बेटी की बिदेश में पढ़ाई के लिये छात्रवृत्ति की व्यवस्था ………!

15-09-1982 मनमोहन सिंह भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर बने ..इस पद पर उनको तीन साल का कार्यकाल पूरा करना था लेकिन इस वीच बोफोर्स कांड सामने आया और मनमोहन ने अज्ञात कारणों से समय से पहले रिजर्व बैंक के गवर्नर का पद छोड़ अपनी पोस्टिंग योजना आयोग में करवाई …!
काल खंड बोफोर्स दलाली कांड के खुलासे के बाद का …. लोकसभा चुनाव के बाद बी.पी. सिंह देश के प्रधानमंत्री बने .. लेकिन इससे पहले ही मनमोहन सिंह नाम के नौकरशाह ने भारत छोड़ जिनेवा की राह पकड़ी और सेक्रेटरी जनरल एंड कमिश्नर साऊथ कमीशन जिनेवा में पद ग्रहण किया …………!

काल खंड 10-11-1990…….. कांग्रेस के समर्थन/ बैशाखियों से चंद्रशेखर भारत के प्रधानमंत्री बने … इसी दौर में फिर से मनमोहन सिंह ने जिनेवा की नौकरी छोड़ भारत की ओर रुख किया और राजीव गाँधी के समर्थन से बनी चंद्रशेखर सरकार में प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार का पद ग्रहण किया .इसी वीच देश में भुगतान संकट की स्थिति पैदा हुई और मनमोहन की सलाह पर भारत का कई टन सोना इंग्लैण्ड की बैंको में गिरवी रखना पड़ा .. जिसकी बदनामी आई प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के हिस्से में ………..!
कालखण्ड नरसिंह राव के प्रधानमंत्री बनने के समय का …………..कांग्रेस की अल्पमत सरकार ने झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के पांच सदस्यों सहित कई सांसदों को खरीद कर अपनी सरकार बचाई .. सरकार बचाने के इस रिश्वती खेल को नाम मिला ‘’झारखण्ड मुक्ति मोर्चा रिश्बत कांड’’ जिसका केस भारत की अदालत में भी चला और कुछ सांसदों को जेल जाना पड़ा ………..इसी सरकार में मनमोहन सिंह नाम का नौकरशाह भारत का बित्त मंत्री बना….!

बाद के घटनाक्रम में कभी देश के बित्त मंत्री रहे प्रणव मुखर्जी के सचिब के रूप में प्रणब मुखर्जी के आधीन काम करने बाले इस नौकरशाह की ताकत और तिकडमो का अंदाज तो लगाईये की उन्ही प्रणब मुखर्जी को इस नौकरशाह की प्रधानमंत्रित्व के नीचे वित्त मंत्री के रूप में काम करना पड़ा ……… इनके खाते में शेयर बाजार का सबसे बड़ा घोटाला भी दर्ज है जिसे हर्सद मेहता कांड के नाम से जाना जाता है जिसमे देश की जनता को खरबो रुपये का चूना लगा था उस समय मनमोहन देश के वित्त मंत्री हुआ करते थे … बाद के समय 2009 में इनकी सरकार बचाने के लिये एक बार फिर एक कांड हुआ जिसे देश .. कैश फार वोट ‘.. नाम के घोटाले के रूप में जनता है ….. इन सब बातो के बाबजूद अगर देश के जादातर नेता समाजसेवी .. बुद्धिजीवी और अन्ना जैसे अनशनकारी इनको व्यक्तिगत रूप से ईमानदार होने का सार्टिफिकेट देते है और भारत का मीडिया भी इनको मिस्टर क्लीन की उपाधि देता है … तो इसे भारत का दुर्भाग्य कहा जाए या बिडंबना इसका निर्णय आप स्वयं करे ……!

कायस्थ (Kayasth biography)

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कायस्थ

कायस्थ भारत में रहने वाले सवर्ण हिन्दू समुदाय की एक जाति है। गुप्तकाल के दौरान कायस्थ नाम की एक उपजाति का उद्भव हुआ। पुराणों के अनुसार कायस्थ प्रशासनिक कार्यों का
19वीं शताब्दी की पुस्तक Calcutta Kayasth से
कुल जनसंख्या
ख़ास आवास क्षेत्र
भाषाएँ
हिन्दी, असमिया, मैथिली, उर्दू, बंगला, मराठी और उड़िया
धर्म

हिंदू धर्म की मान्यता है कि कायस्थ धर्मराज श्री चित्रगुप्त जी की संतान हैं तथा देवता कुल में जन्म लेने के कारण इन्हें ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों धर्मों को धारण करने का अधिकार प्राप्त है।

वर्तमान में कायस्थ मुख्य रूप से बिसारिया , श्रीवास्तव, सक्सेना,निगम, माथुर, भटनागर, लाभ, लाल, कुलश्रेष्ठ, अस्थाना, कर्ण, वर्मा, खरे, राय, सुरजध्वज, विश्वास, सरकार, बोस, दत्त, चक्रवर्ती, श्रेष्ठ, प्रभु, ठाकरे, आडवाणी, नाग, गुप्त, रक्षित, बक्शी, मुंशी, दत्ता, देशमुख, पटनायक, नायडू, सोम, पाल, राव, रेड्डी, मेहता आदि उपनामों से जाने जाते हैं। वर्तमान में कायस्थों ने राजनीति और कला के साथ विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों में सफलतापूर्वक विद्यमान हैं। वेदों के अनुसार कायस्थ का उद्गम ब्रह्मा ही हैं। उन्हें ब्रह्मा जी ने अपनी काया की सम्पूर्ण अस्थियों से बनाया था, तभी इनका नाम काया+अस्थि = कायस्थ हुआ।

परिचय संपादित करें

स्वामी विवेकानन्द ने अपनी जाति की व्याख्या कुछ इस प्रकार की है:

“ मैं उन महापुरुषों का वंशधर हूँ, जिनके चरण कमलों पर प्रत्येक ब्राह्मण यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नमः का उच्चारण करते हुए पुष्पांजलि प्रदान करता है और जिनके वंशज विशुद्ध रूप से क्षत्रिय हैं। यदि अपने पुराणों पर विश्वास हो तो, इन समाज सुधारकों को जान लेना चाहिए कि मेरी जाति ने पुराने जमाने में अन्य सेवाओं के अतिरिक्त कई शताब्दियों तक आधे भारत पर शासन किया था। यदि मेरी जाति की गणना छोड़ दी जाये, तो भारत की वर्तमान सभ्यता का शेष क्या रहेगा? अकेले बंगाल में ही मेरी जाति में सबसे बड़े कवि, इतिहासवेत्ता, दार्शनिक, लेखक और धर्म प्रचारक हुए हैं। मेरी ही जाति ने वर्तमान समय के सबसे बड़े वैज्ञानिक (जगदीश चन्द्र बसु) से भारतवर्ष को विभूषित किया है। स्मरण करो एक समय था जब आधे से अधिक भारत पर कायस्थों का शासन था। कश्मीर में दुर्लभ बर्धन कायस्थ वंश, काबुल और पंजाब में जयपाल कायस्थ वंश, गुजरात में बल्लभी कायस्थ राजवंश, दक्षिण में चालुक्य कायस्थ राजवंश, उत्तर भारत में देवपाल गौड़ कायस्थ राजवंश तथा मध्य भारत में सातवाहन और परिहार कायस्थ राजवंश सत्ता में रहे हैं। अतः हम सब उन राजवंशों की संतानें हैं। हम केवल बाबू बनने के लिये नहीं, अपितु हिन्दुस्तान पर प्रेम, ज्ञान और शौर्य से परिपूर्ण उस हिन्दू संस्कृति की स्थापना के लिये पैदा हुए हैं। ”
—स्वामी विवेकानन्द

परिवार संपादित करें

पद्म पुराण के अनुसार कायस्थ कुल के ईष्ट देव श्री चित्रगुप्त जी के दो विवाह हुए। इनकी प्रथम पत्नी सूर्यदक्षिणा (जिन्हें नंदिनी भी कहते हैं) सूर्य-पुत्र श्राद्धदेव की कन्या थी, इनसे ४ पुत्र हुए-भानू, विभानू, विश्वभानू और वीर्यभानू । इनकी द्वितीय पत्नी ऐरावती (जिसे शोभावती भी कहते हैं) धर्मशर्मा नामक ब्राह्मण की कन्या थी, इनसे ८ पुत्र हुए चारु, चितचारु, मतिभान, सुचारु, चारुण, हिमवान, चित्र एवं अतिन्द्रिय कहलाए। इसका उल्लेख अहिल्या, कामधेनु, धर्मशास्त्र एवं पुराणों में भी किया गया है। चित्रगुप्त जी के बारह पुत्रों का विवाह नागराज वासुकी की बारह कन्याओं से सम्पन्न हुआ। इसी कारण कायस्थों की ननिहाल नागवंश मानी जाती है और नागपंचमी के दिन नाग पूजा की जाती है। नंदिनी के चार पुत्र काश्मीर के निकटवर्ती क्षेत्रों में जाकर बस गये तथा ऐरावती के आठ पुत्रों ने गौड़ देश के आसपास (वर्तमान बिहार, उड़ीसा, तथा बंगाल) में जा कर निवास किया। वर्तमान बंगाल उस काल में गौड़ देश कहलाता था

शाखाएं संपादित करें

इन बारह पुत्रों के दंश के अनुसार कायस्थ कुल में १२ शाखाएं हैं जो – श्रीवास्तव, सूर्यध्वज, वाल्मीक, अष्ठाना, माथुर, गौड़, भटनागर, सक्सेना, अम्बष्ठ, निगम, कर्ण, कुलश्रेष्ठ नामों से चलती हैं।[6] अहिल्या, कामधेनु, धर्मशास्त्र एवं पुराणों के अनुसार इन बारह पुत्रों का विवरण इस प्रकार से है:

नंदिनी-पुत्र संपादित करें
भानु संपादित करें
प्रथम पुत्र भानु कहलाये जिनका राशि नाम धर्मध्वज था| चित्रगुप्त जी ने श्रीभानु को श्रीवास (श्रीनगर) और कान्धार क्षेत्रों में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था| उनका विवाह नागराज वासुकी की पुत्री पद्मिनी से हुआ था एवं देवदत्त और घनश्याम नामक दो पुत्रों हुए। देवदत्त को कश्मीर एवं घनश्याम को सिन्धु नदी के तट का राज्य मिला। श्रीवास्तव २ वर्गों में विभाजित हैं – खर एवं दूसर। इनके वंशज आगे चलकर कुछ विभागों में विभाजित हुए जिन्हें अल कहा जाता है। श्रीवास्तवों की अल इस प्रकार हैं – वर्मा, सिन्हा, अघोरी, पडे, पांडिया,रायजादा, कानूनगो, जगधारी, प्रधान, बोहर, रजा सुरजपुरा,तनद्वा, वैद्य, बरवारिया, चौधरी, रजा संडीला, देवगन, इत्यादि।

विभानू संपादित करें
द्वितीय पुत्र विभानु हुए जिनका राशि नाम श्यामसुंदर था। इनका विवाह मालती से हुआ। चित्रगुप्त जी ने विभानु को काश्मीर के उत्तर क्षेत्रों में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। इन्होंने अपने नाना सूर्यदेव के नाम से अपने वंशजों के लिये सूर्यदेव का चिन्ह अपनी पताका पर लगाने का अधिकार एवं सूर्यध्वज नाम दिया। अंततः वह मगध में आकर बसे।

विश्वभानू संपादित करें
तृतीय पुत्र विश्वभानु हुए जिनका राशि नाम दीनदयाल था और ये देवी शाकम्भरी की आराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने उनको चित्रकूट और नर्मदा के समीप वाल्मीकि क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। इनका विवाह नागकन्या देवी बिम्ववती से हुआ एवं इन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा भाग नर्मदा नदी के तट पर तपस्या करते हुए बिताया जहां तपस्या करते हुए उनका पूर्ण शरीर वाल्मीकि नामक लता से ढंक गया था, अतः इनके वंशज वाल्मीकि नाम से जाने गए और वल्लभपंथी बने। इनके पुत्र श्री चंद्रकांत गुजरात जाकर बसे तथा अन्य पुत्र अपने परिवारों के साथ उत्तर भारत में गंगा और हिमालय के समीप प्रवासित हुए। वर्तमान में इनके वंशज गुजरात और महाराष्ट्र में पाए जाते हैं , उनको “वल्लभी कायस्थ” भी कहा जाता है।

वीर्यभानू संपादित करें
चौथे पुत्र वीर्यभानु का राशि नाम माधवराव था और इनका विवाह देवी सिंघध्वनि से हुआ था। ये देवी शाकम्भरी की पूजा किया करते थे। चित्रगुप्त जी ने वीर्यभानु को आदिस्थान (आधिस्थान या आधिष्ठान) क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। इनके वंशजों ने आधिष्ठान नाम से अष्ठाना नाम लिया एवं रामनगर (वाराणसी) के महाराज ने उन्हें अपने आठ रत्नों में स्थान दिया। वर्तमान में अष्ठाना उत्तर प्रदेश के कई जिले और बिहार के सारन, सिवान , चंपारण, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी,दरभंगा और भागलपुर क्षेत्रों में रहते हैं। मध्य प्रदेश में भी उनकी संख्या है। ये ५ अल में विभाजित हैं |

ऐरावती-पुत्र संपादित करें
चारु संपादित करें
ऐरावती के प्रथम पुत्र का नाम चारु था एवं ये गुरु मथुरे के शिष्य थे तथा इनका राशि नाम धुरंधर था। इनका विवाह नागपुत्री पंकजाक्षी से हुआ एवं ये दुर्गा के भक्त थे। चित्रगुप्त जी ने चारू को मथुरा क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था अतः इनके वंशज माथुर नाम से जाने गये। तत्कालीन मथुरा राक्षसों के अधीन था और वे वेदों को नहीं मानते थे। चारु ने उनको हराकर मथुरा में राज्य स्थापित किया। तत्पश्चात् इन्होंने आर्यावर्त के अन्य भागों में भी अपने राज्य का विस्तार किया। माथुरों ने मथुरा पर राज्य करने वाले सूर्यवंशी राजाओं जैसे इक्ष्वाकु, रघु, दशरथ और राम के दरबार में भी कई महत्त्वपूर्ण पद ग्रहण किये। वर्तमान माथुर ३ वर्गों में विभाजित हैं -देहलवी,खचौली एवं गुजरात के कच्छी एवं इनकी ८४ अल हैं। कुछ अल इस प्रकार हैं- कटारिया, सहरिया, ककरानिया, दवारिया,दिल्वारिया, तावाकले, राजौरिया, नाग, गलगोटिया, सर्वारिया,रानोरिया इत्यादि। एक मान्यता अनुसार माथुरों ने पांड्या राज्य की स्थापना की जो की वर्तमान में मदुरै, त्रिनिवेल्ली जैसे क्षेत्रों में फैला था। माथुरों के दूत रोम के ऑगस्टस कैसर के दरबार में भी गए थे।

सुचारु संपादित करें
द्वितीय पुत्र सुचारु गुरु वशिष्ठ के शिष्य थे और उनका राशि नाम धर्मदत्त था। ये देवी शाकम्बरी की आराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने सुचारू को गौड़ देश में राज्य स्थापित करने भेजा था एवं इनका विवाह नागराज वासुकी की पुत्री देवी मंधिया से हुआ। इनके वंशज गौड़ कहलाये एवं ये ५ वर्गों में विभाजित हैं: – खरे, दुसरे, बंगाली, देहलवी, वदनयुनि। गौड़ कायस्थों को ३२ अल में बांटा गया है। गौड़ कायस्थों में महाभारत के भगदत्त और कलिंग के रुद्रदत्त राजा हुए थे।

चित्र संपादित करें
तृतीय पुत्र चित्र हुए जिन्हें चित्राख्य भी कहा जाता है, गुरू भट के शिष्य थे, अतः भटनागर कहलाये। इनका विवाह देवी भद्रकालिनी से हुआ था तथा ये देवी जयंती की अराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने चित्राक्ष को भट देश और मालवा में भट नदी के तट पर राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। इन क्ष्त्रों के नाम भी इन्हिं के नाम पर पड़े हैं। इन्होंने चित्तौड़ एवं चित्रकूट की स्थापना की और वहीं बस गए। इनके वंशज भटनागर के नाम से जाने गए एवं ८४ अल में विभाजित हैं, इनकी कुछ अल इस प्रकार हैं- डसानिया, टकसालिया, भतनिया, कुचानिया, गुजरिया,बहलिवाल, महिवाल, सम्भाल्वेद, बरसानिया, कन्मौजिया इत्यादि| भटनागर उत्तर भारत में कायस्थों के बीच एक आम उपनाम है।

मतिभान संपादित करें
चतुर्थ पुत्र मतिमान हुए जिन्हें हस्तीवर्ण भी कहा जाता है। इनका विवाह देवी कोकलेश में हुआ एवं ये देवी शाकम्भरी की पूजा करते थे। चित्रगुप्त जी ने मतिमान को शक् इलाके में राज्य स्थापित करने भेजा। उनके पुत्र महान योद्धा थे और उन्होंने आधुनिक काल के कान्धार और यूरेशिया भूखंडों पर अपना राज्य स्थापित किया। ये शक् थे और शक् साम्राज्य से थे तथा उनकी मित्रता सेन साम्राज्य से थी, तो उनके वंशज शकसेन या सक्सेना कहलाये। आधुनिक इरान का एक भाग उनके राज्य का हिस्सा था। वर्तमान में ये कन्नौज, पीलीभीत, बदायूं, फर्रुखाबाद, इटाह,इटावा, मैनपुरी, और अलीगढ में पाए जाते हैं| सक्सेना लोग खरे और दूसर में विभाजित हैं और इस समुदाय में १०६ अल हैं, जिनमें से कुछ अल इस प्रकार हैं- जोहरी, हजेला, अधोलिया, रायजादा, कोदेसिया, कानूनगो, बरतरिया, बिसारिया, प्रधान, कम्थानिया, दरबारी, रावत, सहरिया,दलेला, सोंरेक्षा, कमोजिया, अगोचिया, सिन्हा, मोरिया, इत्यादि|

हिमवान संपादित करें
पांचवें पुत्र हिमवान हुए जिनका राशि नाम सरंधर था उनका विवाह भुजंगाक्षी से हुआ। ये अम्बा माता की अराधना करते थे तथा चित्रगुप्त जी के अनुसार गिरनार और काठियवार के अम्बा-स्थान नामक क्षेत्र में बसने के कारण उनका नाम अम्बष्ट पड़ा। हिमवान के पांच पुत्र हुए: नागसेन, गयासेन, गयादत्त, रतनमूल और देवधर। ये पाँचों पुत्र विभिन्न स्थानों में जाकर बसे और इन स्थानों पर अपने वंश को आगे बढ़ाया। इनमें नागसेन के २४ अल, गयासेन के ३५ अल, गयादत्त के ८५ अल, रतनमूल के २५ अल तथा देवधर के २१ अल हैं। कालाम्तर में ये पंजाब में जाकर बसे जहाँ उनकी पराजय सिकंदर के सेनापति और उसके बाद चन्द्रगुप्त मौर्य के हाथों हुई। मान्यता अनुसार अम्बष्ट कायस्थ बिजातीय विवाह की परंपरा का पालन करते हैं और इसके लिए “खास घर” प्रणाली का उपयोग करते हैं। इन घरों के नाम उपनाम के रूप में भी प्रयोग किये जाते हैं। ये “खास घर” वे हैं जिनसे मगध राज्य के उन गाँवों का नाम पता चलता है जहाँ मौर्यकाल में तक्षशिला से विस्थापित होने के उपरान्त अम्बष्ट आकर बसे थे। इनमें से कुछ घरों के नाम हैं- भीलवार, दुमरवे, बधियार, भरथुआर, निमइयार, जमुआर,कतरयार पर्वतियार, मंदिलवार, मैजोरवार, रुखइयार, मलदहियार,नंदकुलियार, गहिलवार, गयावार, बरियार, बरतियार, राजगृहार,देढ़गवे, कोचगवे, चारगवे, विरनवे, संदवार, पंचबरे, सकलदिहार,करपट्ने, पनपट्ने, हरघवे, महथा, जयपुरियार, आदि|

चित्रचारु संपादित करें
छठवें पुत्र का नाम चित्रचारु था जिनका राशि नाम सुमंत था और उनका विवाह अशगंधमति से हुआ। ये देवी दुर्गा की अराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने चित्रचारू को महाकोशल और निगम क्षेत्र (सरयू नदी के तट पर) में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। उनके वंशज वेदों और शास्त्रों की विधियों में पारंगत थे जिससे उनका नाम निगम पड़ा। वर्तमान में ये कानपुर, फतेहपुर, हमीरपुर, बंदा, जलाओं,महोबा में रहते हैं एवं ४३ अल में विभाजित हैं। कुछ अल इस प्रकार हैं- कानूनगो, अकबरपुर, अकबराबादी, घताम्पुरी,चौधरी, कानूनगो बाधा, कानूनगो जयपुर, मुंशी इत्यादि।

चित्रचरण संपादित करें
सातवें पुत्र चित्रचरण थे जिनका राशि नाम दामोदर था एवं उनका विवाह देवी कोकलसुता से हुआ। ये देवी लक्ष्मी की आराधना करते थे और वैष्णव थे। चित्रगुप्त जी ने चित्रचरण को कर्ण क्षेत्र (वर्तमाआन कर्नाटक) में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। इनके वंशज कालांतर में उत्तरी राज्यों में प्रवासित हुए और वर्तमान में नेपाल, उड़ीसा एवं बिहार में पाए जाते हैं। ये बिहार में दो भागों में विभाजित है: गयावाल कर्ण – गया में बसे एवं मैथिल कर्ण जो मिथिला में जाकर बसे। इनमें दास, दत्त, देव, कण्ठ, निधि,मल्लिक, लाभ, चौधरी, रंग आदि पदवी प्रचलित हैं। मैथिल कर्ण कायस्थों की एक विशेषता उनकी पंजी पद्धति है, जो वंशावली अंकन की एक प्रणाली है। कर्ण ३६० अल में विभाजित हैं। इस विशाल संख्या का कारण वह कर्ण परिवार हैं जिन्होंने कई चरणों में दक्षिण भारत से उत्तर की ओर प्रवास किया। यह ध्यानयोग्य है कि इस समुदाय का महाभारत के कर्ण से कोई सम्बन्ध नहीं है।

चारुण संपादित करें
अंतिम या आठवें पुत्र चारुण थे जो अतिन्द्रिय भी कहलाते थे। इनका राशि नाम सदानंद है और उन्होंने देवी मंजुभाषिणी से विवाह किया। ये देवी लक्ष्मी की आराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने अतिन्द्रिय को कन्नौज क्षेत्र में राज्य स्थापित करने भेजा था। अतियेंद्रिय चित्रगुप्त जी की बारह संतानों में से सर्वाधिक धर्मनिष्ठ और सन्यासी प्रवृत्ति वाले थे। इन्हें ‘धर्मात्मा’ और ‘पंडित’ नाम से भी जाना गया और स्वभाव से धुनी थे। इनके वंशज कुलश्रेष्ठ नाम से जाने गए तथा आधुनिक काल में ये मथुरा, आगरा, फर्रूखाबाद, एटा, इटावा और मैनपुरी में पाए जाते हैं | कुछ कुलश्रेष्ठ जो की माता नंदिनी के वंश से हैं, नंदीगांव – बंगाल में पाए जाते हैं |

Punjab national bank fraud

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पीएनबी घोटाला 2011 से चल रहा था उस समय मोदीजी देश के प्रधानमंत्री थे ओर मनमोहन सिंह पकौड़े बेचते थे

मुझे जेटली पर पुरा भरोसा है जेटली #नीरव_मोदी से पाई पाई सूद समेत वसूल करेगा।
जो बंदा जनता को निचोड़ सकता है क्या वो लूटेरों को बख्शेंगा ? कभी नहीं।

कांग्रेस के पापों के लिये मोदी जी को कोसना सहीं नहीं है।ED ने आज नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के गीतांजलि जेम्स के 17 ठिकानों पर छापे मारे। नीरव मोदी के यहां छापे के दौरान 5100 करोड़ रुपए के हीरे-जवाहरात और सोना जब्त किया #PNBScam

सुनने में आ रिया है की PNB घोटाले का अभियुक्त किसी कांग्रेस नेता की महंगी बिल्डिंग को किराए पर लेकर 35 लाख रुपया महीना किराया दे रहा है और इटालियन पंडत राहुल गान्धी का भी इस घोटालेवाज के यहाँ आना जाना रहा है ………!!!

Talwe chat

Beer baar wali NE aur kitne kand kiye h SAB to pata chal raha he

Waiting for Congress to link him with Narendra Modi, if they haven’t already.

Rudra Barot read this post

चौराहे पे कुछ आपिये नाच रहे थे ,,
,एक ने कारण पूंछा तो आपिये बोले मोदी बैंक का रुपया लेके भाग गया,,,
वो बोला पर उसका नाम तो नीरव मोदी है नरेंद मोदी नही ,,

तो आपिये बोले सरनेम मोदी है न यही बहुत है हमारे लिए 😂😂😂

मनमोहन सरकार के घोटालों का सिर्फ़ current account ही नहीं था बल्कि FD account भी था वही FD आज मेच्योर होकर PNB घोटाला बन गया ।।

Nirav modi fraud

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PNB fraud: ED seizes assets worth Rs 5,100 crore during searches in Nirav Modi case

The Enforcement Directorate (ED) today seized diamonds, jewellery and gold worth Rs 5,100 crore during searched in Nirav Modi case. Also, six properties have been sealed by the ED in Mumbai in the Nirav Modi case, news agency Press Trust of India has reported.

A day after a massive $1.77 billion (about Rs 11,400 crore) fraud was unearthed in a PNB branch in Mumbai, the Enforcement Directorate (ED) on Thursday launched a nationwide raid on the offices, showrooms and workshops of billionaire diamond trader Nirav Modi.

ED teams carried out simultaneous raids on Modi’s offices, showrooms and diamond workshops in Mumbai, Surat (Gujarat) and New Delhi.

ED officials landed at Firestar Diamond Pvt Ltd. head office in Bharat Diamond Bourse, in Bandra Kurla Complex, Modi’s private office at Kohinoor City in Kurla West, his showroom and boutique at Itts House in Fort in south Mumbai and a workshop in Peninsula Business Park in Lower Parel.

In Gujarat, six diamond workshops were raided in Surat SEZ at Sachin town and an office in Belgium Towers on Ring Road, the hub of diamond jewellery trade.

Two diamond jewellery boutiques of Modi in New Delhi — in Chanakyapuri and Defence Colony — were also raided.

The multi-pronged action came a day after the Punjab National Bank admitted to unearthing a fraud of Rs 11,515 crore involving Modi’s companies and certain other accounts with the bank’s flagship branch (Brady House) in Mumbai and its second largest lending window in India.

Meanwhile, the Central Bureau of Investigation (CBI) has sealed the residence of Ami Modi, wife of Nirav Modi in Mumbai’s Worli in connection with Punjab National Bank (PNB) fraud case.

The central agency sealed her residence after conducting a raid on February 3 and 4.

The probe agency also seized 95 documents including import bills and applications.

So far, at least 10 bank employees have been suspended but it is not clear whether anybody from the crucial PNB Credit Approval Committee or its Board of Directors figure among them.

The fraud, which includes money-laundering among others, concerns the Firestar Diamonds group in which the CBI last week booked Modi, his wife Ami, brother Nishal and a maternal uncle Mehul Choksi.

It followed a complaint lodged by PNB on January 29 pertaining to an alleged cheating case of Rs 280 crore perpetrated by these four in 2011.

It is learnt that Modi — whose operations are spread across Europe, the US, Middle East and Far East besides India — has written to PNB and other banks that he would return their outstandings.

The latest case — which involves a sum considerably higher than the Vijay Mallya default of around Rs 9,000 crore — comes at a time when the Indian banking system is already grappling with swelling non-performing assets.

Pm modi for India

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उसे अगर वोट ही लेना होता तो वो,
कभी नोटबंदी नहीं करता कभी भी GST नहीं लाता,
उसे वोट ही लेना होता तो वो कभी सब्सिडियाँ ख़त्म नहीं करता, लेकिन
उसने दिल और घुटने के ऑपरेशन के दाम, ढाई लाख से 50 हज़ार करके डॉक्टरों को नाराज़ किया…

उसने 800 दवाओं के दाम कम करके मेडिकल वालो को नाराज किया…

उसने 1% टैक्स लगा कर स्वर्णकारों को नाराज़ किया….

उसने होटल वालों के सर्विस चार्ज पर हथौड़ा चला के, ग्राहकों के हित के लिए होटलवालों से पंगा लिया…

उसने 500 और 1000 के नोट बन्द कर के अपने ही परम्परागत वोट बैंक को नाराज़ किया….

कैश लेस को बढ़ावा दे कर वो टैक्स चोरों के रास्तों का रोड़ा बन गया है….

रेरा जैसा क़ानून कर के बिल्डरों को नाराज़ किया…

बेनामी संपत्ति का क़ानून पारित कर के ज़मीन के काला बाजारियों को बेनक़ाब कर रहा है…

स्पेक्ट्रम, कोयला, आदि का भ्रष्टाचार दूर कर, देश को लाखों करोड़ों का फ़ायदा देने के लिए बड़े उद्योगपतियों से पंगा लिया….

गैस सब्सिडी, मनरेगा, आदि का पैसा सीधे बैंक खाते में जमा करने के कारण सभी बिचौलियों की दुकानें बंद कर दी….

युरिया को नीम कोटिंग करने से केमिकल फ़ैक्टरियों का गोरख धंदा चौपट कर दिया…

2 लाख 24 हज़ार चोर कंपनियों का पंजीकरण रद्द और 1 लाख नकली कंपनियों की पहचान की !!!

लगभग हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार कम करने के नये नये तरीक़ों का आग़ाज़ कर रहा है….

सभी सरकारी कामों में टेक्नॉलजी के कारण गति लाने के प्रयास के कारण दलालों का ‘स्पीड-मनी’ बंद कर रहा है…

और न जाने कितनों को वो रोज़ नाराज़ कर रहा है….

हो सकता है आप भी उस के किसी क़दम से नाराज़ चल रहे हो, आप का भी कुछ नुक़सान हुआ हो….

वो असल में पागल बन गया है क्या? वो चाहता तो आराम से किसी का दिल दुखाए बिना राज कर सकता है…

वह हर रोज़ नये नये क़दम उठा कर देश के हर क्षेत्र की बुराइयाँ दूर करने की रात दिन मेहनत कर रहा है…

क्योंकि…

उसे कुर्सी से प्रेम नहीं है । उसे सिर्फ अपने देश और सवा सौ करोड देशवासियों से प्रेम है…वो अपने देश को दुनियाँ में सबसे समृद्ध बनाना चाहता है…हर बुराई को ख़त्म करना चाहता है…वो भी इसी जनरेशन में…

अब भले ही आप उसे वोट न दें….
हो सकता है उस की कुर्सी 2019 में चली जाएँ लेकिन उसे उस की चिंता नहीं है….

आज जो उसका या उस के समर्थकों का मज़ाक उड़ा रहा है वो वास्तव में खुद का और खुद की भावी पीढी का मज़ाक उड़ा रहा है…।

देश बेचकर अपना जेब भरनेवाले चंद दोगले नेताओं, टीवी चैनलों और ब्युरोक्रेट्स की बातों में आकर उसका साथ छोडा तो खुद को मज़ाक बनने से तुम्हें कोई नहीं रोक सकता।

सरकार की कुछ कमियों को, कुछ अब तक न हुए कामों को बढ़ा चढ़ा कर बोल कर ये लोग आप को गुमराह कर रहे है…

इस स्थिति में सभी खूनी भेडिये उसके खिलाफ लामबंद हो रहे हैं…

लेकिन देश के लिए उसे हमारे साथ की जरुरत है…
इस से भी ज्यादा हमें उस की ज़रूरत है। आप ने उसे हटा दिया तो उस का कुछ नहीं बिगड़नेवाला…वो तो हिमालय चला जाएगा…

लेकिन हमारी अगली नस्लें हमें सैकड़ों सालों तक कोसेगी….

जागो भाइयों,
हमें अपने प्रधानमंत्री का साथ हर हाल में देना ही होगा..हमें उसकी आवाज बननी है…अपने और अपने बच्चों के भविष्य के लिए….

बाकि आपको जो अच्छा लगे कीजिए लेकिन एक बार यह ज़रूर सोचिए कि आखिर वह यह सब काम किसके लिए कर रहा है…हमारे लिए या अपने लिए???

Plz HAVE FAITH in MODI,उसे अपना घर भरना होता तो वह 13 साल गुजरात का CM रह कर भर लेता।
उसे कुर्सी से प्रेम नहीं है सिर्फ अपने देश से प्रेम है…

आप मोदी से उनकी कुर्सी छीन सकते हैं लेकिन वो संकल्प वो महान संकल्प नहीं छीन सकते जो उन्होंने भारत को महान बनाने के लिए लिया हुवा है ..
मुझे गर्व है अपने प्रधान सेवक पर.