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Bablu Kumar Singh Begusarai Bihar India

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बैकुंठ शुक्ल

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सरकारी गवाह बन गये गद्दार फणीन्द्र नाथ घोष की बेतिया के मीना बाजार में हत्या कर भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु की मौत का बदला लेने वाले बैकुंठ शुक्ल को फांसी देने के वक्त गया जेल का सरकारी जल्लाद भी मानो थमक गया था। जेल के सुपरिंटेंडेंट मिस्टर परेरा रुमाल हिलाकर बार-बार संकेत दे रहे थे, पर उससे लीवर नहीं खींचा जा रहा था। शुक्ल जी ने जब चिल्लाकर कहा कि देर क्यों करते हो तो उसकी तंद्रा भंग हुई और उसने लीवर खींचा। उस दिन पूरे गारद में कोई चौकी नहीं गया, किसी ने भोजन नहीं किया, जेल का कोई मुलाजिम रोये बिना नहीं रहा। फांसी के दिन अलस्सुबह पांच बजे जब गया जेल के पंद्रह नंबर वार्ड से बैकुंठ शुक्ल फांसी स्थल की ओर जा रहे थे तो उनकी आखिरी आवाज थी – ‘अब चलता हूं।मैं फिर आऊंगा। देश तो आजाद नहीं हुआ। वंदेमातरम्…।

गया जेल के सात नंबर वार्ड के सेल में फांसी के अभियुक्तों को रखा जाता था और फांसी से एक दिन पहले अभियुक्त को पंद्रह नंबर वार्ड मेंरखकर सुबह फांसी पर लटका दिया जाता था।

दासगुप्त लिखते हैं कि गया जेल में रहते हुए उन्होंने ४५ व्यक्तियों को फांसी के पहले वहां रात बिताते देखा था। ऐसे में ही एक दिन उन्हें पता चला कि बैकुंठ शुक्ल की फांसी का दिन तय कर लिया गया है। वह जाड़े का मौसम था, वह भी गया का जाड़ा-हड्डी कंपाने वाला।
समय गुजरते देर न लगी और वह निर्धारित संध्या आखिर आ पहुंची। फांसी के अन्य अभियुक्तों की भांति बैकुंठ शुक्ल से भेंट करने के लिए हम उत्सुक थे, लेकिन हेड जमादार ने आकर कहा, आज आपलोगों को पहले ही बंद हो जाना पड़ेगा। जब आप लोग अंदर चले जायेंगे, तभी शुक्लजी को लाया जायेगा। एक बार अंतिम दर्शन के लिए अनुरोध करने में भी घृणा महसूस हुई। जो कल मृत्यु का आलिंगन करने जा रहा है, उसे देखने के लिए जल्लाद से अनुनय-विनय? हम अपने-अपने सेल में चले गये। उस दिन जेल के सभी कैदियों को बंद करने के बाद ही बैकुंठ शुक्ल को पंद्रह नंबर में लाया गया।

अभी शाम होने में देर थी। दासगुप्त कुर्ता पहनकर कंबल ओढ़कर लोहे के सीखचों को पकड़े खड़े थे। वे लिखते हैं- जंजीर और बेडिय़ों की झंकार के साथ बैकुंठ शुक्ल पंद्रह नंबर वार्ड में आये और ऊंचे स्वर में बोले-दादा, आ गया। अगल-बगल की सेलों से हम तीनों बोल उठे-वंदे मातरम्। फिर एक नंबर के सेल से शुक्लजी की आवाज आयी-विभूति दा, एक बार खुदीराम का फांसी वाला गीत गाइए न दादा – हासि हासि परब फांसी, मां देखबे भारतवासी (हंस-हंसकर फांसी पर झूलूंगा, भारत माता देखेगी)।
दासगुप्त के साथ-साथ बैकुंठ शुक्ल भी गला खोलकर गा रहे थे-दिले शुक्ल में है, दिले शुक्ल में है, दिले शुक्ल में है। कब चार बज गये, पता ही नहीं चला। बैकुंठ शुक्ल ही बोले-दादा, वक्त नजदीक आ गया है। आखिरी गाना वंदेमातरम् सुनाइए। एक नंबर, आठ नंबर, नौ नंबर, दस नंबर से एक साथ गाने गाये जाने लगे-वंदेमातरम्। लिखते हैं दासगुप्त-जेल गेट पर पांच का घंटा बजा। अभी अंधकार था। एक साथ अनेक भारी-भारी बूटों की आवाज गूंजती हुई पंद्रह नंबर में प्रवेश कर गयी। बैकुंठ शुक्ल ने पुकार कर कहा-‘दादा, अब तो चलना है। मैं एक बात कहना चाहता हूं। आप जेल से बाहर जाने के बाद बिहार में बाल विवाह की जो प्रथा आज भी प्रचलित है, उसे बंद करने का प्रयत्न अवश्य कीजिएगा। पंद्रह नंबर से बाहर निकलने के पहले बैकुंठ शुक्ल क्षण भर के लिए रुके और दासगुप्त की सेल की ओर देखकर बोले-‘अब चलता हूं। मैं फिर आऊंगा। देश तो आजाद नहीं हुआ। वंदेमातरम्…।शुक्लजी की आखिरी आवाज के साथ उस वक्त जेल में बंद तीनों व्यक्तियों की आवाज शामिल हो गयी। बाद में दासगुप्त को वहां के वार्डर ने बताया कि फांसी के वक्त शुक्ल जी के परिवार के साथ बाहर के लोग भी थे। शुक्ल जी की लाश उन्हें नहीं दी गयी। वार्डर ने ही बताया कि उन लोगों ने चंदा करके और कंधे पर ले जाकर शुक्ल जी का दाह-संस्कार किया।

भाजपा के लिए विपक्ष के मायन…

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#भाजपा के लिए #विपक्ष के #मायने…………………

1991 में भारत की अर्थव्यवस्था कंगाल हो गई थी तब प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने #वित्तमंत्री मनमोहन सिंह जी से बुलाकर पूछा,, खजाने में कितने पैसे है ? मनमोहन जी का उत्तर था सिर्फ 9 दिन देश चला सकते है इतना सा #पैसा बचा है,,इस पर नरसिंहराव जी बोले इस स्थिति से कैसे निपटा जाए ,, मनमोहन सिंह बोले देश के रुपये की कीमत 20% गिरानी पड़ेगी,नरसिंहराव जी बोले ठीक है केबिनेट की #बैठक बुलाओ मनमोहन जी उठे और अपने कक्ष की ओर जाने लगे ,,कुछ कदम दूर जाने के बाद वापिस पलट कर आए और नरसिंहराव जी से बोले कि अगर #केबिनेट बैठक बुलाई तो हम ये कठोर निर्णय नही कर पाएंगे । सभी मंत्री वोट बैंक एड्रेस करेंगे,, नरसिंहराव जी ने मनमोहन जी से कहा कि ठीक अभी आप अपने कक्ष में जाइये ,20 मिनिट बाद मनमोहन जी को उनके कमरे में सचिव एक #चिट्ठी देकर गए ,,ओर उस चिट्ठी में नरसिंहराव जी ने लिखा था ,,डन,, बाद में जब पता चला कि 20 मिनिट में ऎसा क्या हो गया था,, जो आपने केबिनेट मीटिंग मनमोहनसिंह सहित सबको आश्चर्य में डालकर हा कर दी,,तब #नरसिंहराव जी ने कहा था कि मेने #अटल जी से बात करली थी और डन कर दिया ,,मतलब आप अटल जी पर #भरोसा अपनी #केबिनेट से भी ज्यादा था,, उन्हें पता था अटल जो #देशहित मे होगा वही बोलेंगे,,ऐसा होता है #राष्ट्रवादी विपक्ष ओर उस कठोर निर्णय की घोषणा के बाद बीजेपी ने विरोध आंदोलन नही किया बल्कि देश की अर्थ #व्यवस्था पटरी पर लाने के लिए #तात्कालिक कोंग्रेस सरकार को साथ दिया,,ओर वही आज कोंग्रेस ने नोट बंदी GST पर कैसा नंगा नाच किया सबने देखा है,,,यही कारण है कि मै #बीजेपी को राष्ट्रवादी दल कहता हूं जो दल से पहले देश को रखता है,,,,,,,,,,!!!!

वन्देमातरम……..!!!!
भारत माता की जय हो!!!!

क्यों संघ के कार्यालय नागपुर में पहले तिरंगा नही लहराया जाता था ?

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आज तड़के तड़के ही एक भाई का सवाल मिला : आरोप लगता है कि संघ के कार्यालय नागपुर में पहले तिरंगा नही लहराया जाता था, क्या ये तथ्य सही है?

इतिहास तो ज्यादा मुझे भी नहीं पता, जिसको पता वो सत्यापित नहीं कर सकता क्योंकि भारत का इतिहास लिखने वाले कई लोग रहे हैं।
ना पैरवी कर रहा हूँ ना आरोप लगा रहा हूँ।
भाई ने पूछा है तो मैं केवल तब किसी की मनोस्थिति को समझने समझाने का प्रयास कर रहा हूँ।

समझिए आपका घर बन रहा है। घर का रंग आप और आपके भाई कुछ और करना चाहते हैं लेकिन अंत में फुफे की चलती है और कोई और ही रंग हो जाता है।
हालांकि आपके बच्चे पोते क्योंकि जन्म लेने के बाद घर का वही रूप देखेंगे सो उसी से प्यार करेंगे, लेकिन आप,
आपको फुफे की पसंद को जल्दी स्वीकार नहीं कर पाओगे।
ध्यान रहे, तिरंगे के लिए कोई जनमत नहीं हुआ था। यह बस ऐसा था जिसे हर हाल में स्वीकारना था। यदि 1947 में आप होते तो संभवतः आपके मन में भी खटास उत्पन्न होती क्योंकि समानांतर ही भारत धर्म के आधार पर दो टुकड़ों में टूटा था।
उदाहरण आज आप प्रधानमंत्री का ले लीजिए,
तिरंगे के जनमत नहीं था लेकिन नरेंद्र मोदी चुनाव के द्वारा चुने गए प्रधानमंत्री हैं। कर्म ऐसे हैं कि 70 साल बाद इनका कद आज से कहीं बड़ा होगा। लेकिन मोदी जी के आलोचकों ने मोदी जी को क्या क्या तक नहीं कहा। यही सब स्वामी विवेकानंद के साथ भी हुआ था, उनके भी विरोधी हुए थे तब, जो उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं कर सके लेकिन आज केवल चाहने वाले हैं।

लोग मरते रहते हैं, चेहरे बदलते रहते हैं,
समय बदलता है, समय के साथ समाज की मनोस्थिति भीबदल जाती है। विषय को थोड़ा आगे बढ़ाएं तो,
आजादी से पहले, आजादी के समय और आजादी के तुरंत बाद भारतीयों की मनोस्थिति को आज वर्तमान समय लोग आसानी से समझ नहीं सकते।

ब्रिटिशर तो गिने चुने थे, भारतीयों पर जुल्म करने वाले तो अपने ही लोग थे।
जलियावाला बाग में आदेश भर था जनरल डायर का तो,
दिमाग पे जोर लगाइए वहाँ गोलियाँ कौन कौन चला रहे थे? शत प्रतिशत वो भारत के ही लाल थे।
उनमें से एक लाल बस एक लाल घूम के गोली डायर को ठोक देता तो जलियावाला कांड ही ना होता।

तब भी अधिकांश लोग अपने निजी स्वार्थ को ही आगे रखते थे जैसे आज। अंग्रेजो के यहाँ नौकरी ऐसी थी जैसे आज सिविल सर्विस में सिलेक्शन हो जाता है। शादी के लिए बेटे के भाव आसमान पर और ऐसा दामाद पाकर लड़कीं वाले भी धन्य हो जाते थे।
भगत सिंह के वंसज अभावों में जीते रहे लेकिन अंग्रेजों के लाखों टट्टुओं की संतानो ने आज तक गरीबी नहीं देखी है।
अरे हमें तो अपनों लूटा था अंग्रेजों में कहाँ दम था।
स्वार्थ का ही गम आज है उस दौर का भी यही गम था

Source : fb