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भाजपा के लिए विपक्ष के मायन…

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#भाजपा के लिए #विपक्ष के #मायने…………………

1991 में भारत की अर्थव्यवस्था कंगाल हो गई थी तब प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने #वित्तमंत्री मनमोहन सिंह जी से बुलाकर पूछा,, खजाने में कितने पैसे है ? मनमोहन जी का उत्तर था सिर्फ 9 दिन देश चला सकते है इतना सा #पैसा बचा है,,इस पर नरसिंहराव जी बोले इस स्थिति से कैसे निपटा जाए ,, मनमोहन सिंह बोले देश के रुपये की कीमत 20% गिरानी पड़ेगी,नरसिंहराव जी बोले ठीक है केबिनेट की #बैठक बुलाओ मनमोहन जी उठे और अपने कक्ष की ओर जाने लगे ,,कुछ कदम दूर जाने के बाद वापिस पलट कर आए और नरसिंहराव जी से बोले कि अगर #केबिनेट बैठक बुलाई तो हम ये कठोर निर्णय नही कर पाएंगे । सभी मंत्री वोट बैंक एड्रेस करेंगे,, नरसिंहराव जी ने मनमोहन जी से कहा कि ठीक अभी आप अपने कक्ष में जाइये ,20 मिनिट बाद मनमोहन जी को उनके कमरे में सचिव एक #चिट्ठी देकर गए ,,ओर उस चिट्ठी में नरसिंहराव जी ने लिखा था ,,डन,, बाद में जब पता चला कि 20 मिनिट में ऎसा क्या हो गया था,, जो आपने केबिनेट मीटिंग मनमोहनसिंह सहित सबको आश्चर्य में डालकर हा कर दी,,तब #नरसिंहराव जी ने कहा था कि मेने #अटल जी से बात करली थी और डन कर दिया ,,मतलब आप अटल जी पर #भरोसा अपनी #केबिनेट से भी ज्यादा था,, उन्हें पता था अटल जो #देशहित मे होगा वही बोलेंगे,,ऐसा होता है #राष्ट्रवादी विपक्ष ओर उस कठोर निर्णय की घोषणा के बाद बीजेपी ने विरोध आंदोलन नही किया बल्कि देश की अर्थ #व्यवस्था पटरी पर लाने के लिए #तात्कालिक कोंग्रेस सरकार को साथ दिया,,ओर वही आज कोंग्रेस ने नोट बंदी GST पर कैसा नंगा नाच किया सबने देखा है,,,यही कारण है कि मै #बीजेपी को राष्ट्रवादी दल कहता हूं जो दल से पहले देश को रखता है,,,,,,,,,,!!!!

वन्देमातरम……..!!!!
भारत माता की जय हो!!!!

क्यों संघ के कार्यालय नागपुर में पहले तिरंगा नही लहराया जाता था ?

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आज तड़के तड़के ही एक भाई का सवाल मिला : आरोप लगता है कि संघ के कार्यालय नागपुर में पहले तिरंगा नही लहराया जाता था, क्या ये तथ्य सही है?

इतिहास तो ज्यादा मुझे भी नहीं पता, जिसको पता वो सत्यापित नहीं कर सकता क्योंकि भारत का इतिहास लिखने वाले कई लोग रहे हैं।
ना पैरवी कर रहा हूँ ना आरोप लगा रहा हूँ।
भाई ने पूछा है तो मैं केवल तब किसी की मनोस्थिति को समझने समझाने का प्रयास कर रहा हूँ।

समझिए आपका घर बन रहा है। घर का रंग आप और आपके भाई कुछ और करना चाहते हैं लेकिन अंत में फुफे की चलती है और कोई और ही रंग हो जाता है।
हालांकि आपके बच्चे पोते क्योंकि जन्म लेने के बाद घर का वही रूप देखेंगे सो उसी से प्यार करेंगे, लेकिन आप,
आपको फुफे की पसंद को जल्दी स्वीकार नहीं कर पाओगे।
ध्यान रहे, तिरंगे के लिए कोई जनमत नहीं हुआ था। यह बस ऐसा था जिसे हर हाल में स्वीकारना था। यदि 1947 में आप होते तो संभवतः आपके मन में भी खटास उत्पन्न होती क्योंकि समानांतर ही भारत धर्म के आधार पर दो टुकड़ों में टूटा था।
उदाहरण आज आप प्रधानमंत्री का ले लीजिए,
तिरंगे के जनमत नहीं था लेकिन नरेंद्र मोदी चुनाव के द्वारा चुने गए प्रधानमंत्री हैं। कर्म ऐसे हैं कि 70 साल बाद इनका कद आज से कहीं बड़ा होगा। लेकिन मोदी जी के आलोचकों ने मोदी जी को क्या क्या तक नहीं कहा। यही सब स्वामी विवेकानंद के साथ भी हुआ था, उनके भी विरोधी हुए थे तब, जो उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं कर सके लेकिन आज केवल चाहने वाले हैं।

लोग मरते रहते हैं, चेहरे बदलते रहते हैं,
समय बदलता है, समय के साथ समाज की मनोस्थिति भीबदल जाती है। विषय को थोड़ा आगे बढ़ाएं तो,
आजादी से पहले, आजादी के समय और आजादी के तुरंत बाद भारतीयों की मनोस्थिति को आज वर्तमान समय लोग आसानी से समझ नहीं सकते।

ब्रिटिशर तो गिने चुने थे, भारतीयों पर जुल्म करने वाले तो अपने ही लोग थे।
जलियावाला बाग में आदेश भर था जनरल डायर का तो,
दिमाग पे जोर लगाइए वहाँ गोलियाँ कौन कौन चला रहे थे? शत प्रतिशत वो भारत के ही लाल थे।
उनमें से एक लाल बस एक लाल घूम के गोली डायर को ठोक देता तो जलियावाला कांड ही ना होता।

तब भी अधिकांश लोग अपने निजी स्वार्थ को ही आगे रखते थे जैसे आज। अंग्रेजो के यहाँ नौकरी ऐसी थी जैसे आज सिविल सर्विस में सिलेक्शन हो जाता है। शादी के लिए बेटे के भाव आसमान पर और ऐसा दामाद पाकर लड़कीं वाले भी धन्य हो जाते थे।
भगत सिंह के वंसज अभावों में जीते रहे लेकिन अंग्रेजों के लाखों टट्टुओं की संतानो ने आज तक गरीबी नहीं देखी है।
अरे हमें तो अपनों लूटा था अंग्रेजों में कहाँ दम था।
स्वार्थ का ही गम आज है उस दौर का भी यही गम था

Source : fb

काले हीरे का बादशाह बीपी सिन्हा (भूमिहार) (B.P. Sinha)

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जब हम काले हीरे की बात करते हैं तो हमें तत्कालीन बिहार राज्य के कुछ प्रमुख शहर झरिया, धनबाद, वासेपुर (वर्तमान झारखण्ड) की और हमारा ध्यान आकर्षित होता है | ये शहर जहाँ कभी छोटे – छोटे गाँव और बस्ती हुआ करते थे, आज बड़ी – बड़ी इमारतें देखने को मिलती है और फर्राटे से दौड़तीं गाडियां, वहाँ कभी घोड़ों की टाप के साथ – साथ बैलगाड़ी के पहियों के स्वर सुनाई पड़ते थे |

एक ओजस्वी नौजवान की सफर 1957-1958 के मध्य से शुरू होती है, बिहार के पटना जिले स्थित बाढ़ अनुमंडल का एक युवक नौकरी की तलाश में भटकते हुए कोल नगरी धनबाद आ पहुंचाता है | उस युवक की नजर काले हीरे की खान पर जा टिकती है | वह कोयले की खानों से अपने नए जीवन की शुरुवात करता है | कोयलांचल की जीवन शैली में वह इतना रम जाता है की मजदूर संघ में जगह मिलने के कुछ समय पश्चात ही वह मजदूर संघ का मुख्य नेता बन जाता है | लगता था जैसे काला हीरा स्वयं अपना जोहरी तलाश रहा था वर्षों से | कालांतर में वह पूरे कोल नगरी का बेताज बादशाह बन जाता है वह जोहरी और यहीं से शुरू होता है कोयलांचल के वर्चस्व और खुनी जंग की कहानी “ गैंग्स ऑफ वासेपुर “ |

भूमिहार ब्राह्मण परिवार में जन्मे जिस काले हीरे के पारखी की हम बात कर रहे हैं यह कोई और नहीं, यह कोल माफिया बिरेन्द्र प्रताप सिन्हा (बीपी सिन्हा) जी थे | आपने अमरीका के व्हाइट हॉउस का नाम तो सुना ही होगा ठीक वैसा ही कुछ सिन्हा जी का आवास व्हाईट हाउस के रूप में मशहूर हुआ था उन दिनों , जो आज भी उनकी याद को ताजा करता है गुजरते हुए राहगीरों को |

पहले कोयलांचल का इलाका ‘वासेपुर’ किसी ज़माने में मुस्लिम बाहुबल गाँव हुआ करता था, छोटी – छोटी कई बस्तियां भी थीं, वहाँ किसानों द्वारा खेती हुआ करती थी | लेकिन जब अंग्रेजों को कोयला भंडार का पता चला तब उन्होंने वहाँ कोयला निकलने के लिए कारखाना का निर्माण किया और धीरे धीरे खेती बंद होती चली गई और वह इलाका काले हीरे के भंडार के नाम से जाना गया जिसे हम आज कोल नगरी के नाम से जानते हैं | कोयला अंग्रेजों के ज़माने में कारखाना और रेल चलाने का मुख्य स्रोत था, उनके द्वारा वास्तव में कोल नगरी बसाने का मुख्य वजह यह ही था | 1947 में जब अंग्रेज देश छोड़कर चले जाते हैं तब कोयले की ज्यादातर खदानें निजी संस्थाओं के हाथों में थी | उस वक्त अधिकांश खदान मालिक राजस्थान और गुजरात से जुड़े थे जबकि माइनर्स तत्कालीन उत्तर बिहार और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के होते थे | कहते हैं कोयला श्रमिकों के लिए मात्र काला पत्थर ही था जबकि खदान मालिकों एवं माफियाओं के लिए काले हीरे से कम न था | वहाँ खदान मालिकों की मिलकियत कोयला खदानों पर चलती थी | खदान मालिक खदान को चलाने के लिए गुंडों को दाना – पानी दिया करते थे | इस धंधे में वर्चस्व को लेकर छोटी मोटी घटनाएं अक्सर हुआ करती थीं, लेकिन माफियाओं का दौर साठ के दशक में शुरू होता है | इसी दौरान बीपी सिन्हा मजदूर आंदोलन में कूद गए और ट्रेड यूनियन के सबसे बड़े मजदुर नेता के रूप में उभर कर सामने आए | देखते ही देखते 10 साल के अंदर बीपी सिन्हा की पकड़ पूरे कोयले की नगरी पर हो जाती है | आंकड़ों के मुताबिक धनबाद में कोयले के कारोबार पर कब्जे को लेकर 1967 तक छिड़ी जंग में दर्जनों दबंग कारोबारियों और नेताओं की बलि दी जा चुकी थी |

कोल माइनिंग पर वर्चस्व के लिए मजदूर संघ का मजबूत होना बहुत ही आवश्यक था, बीपी सिन्हा इस बात को बखूबी जानते थे | जब 17 अक्टूबर 1971 को कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाता है तब राष्ट्रीयकरण होते ही बीपी सिन्हा का कोल नगरी पर पकड़ और अधिक मजबूत हो जाता है, पूरे कोल माइनिंग में उनकी तूती बोलने लगती है, उनका अब कोयले की खदानों पर एकछत्र राज्य चलने लगता है | वह कांग्रेस के प्रचारक थे और कोल माइनिंग में भारतीय राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ की तूती बोलती थी | किद्वान्ति है की उनका माफिया राज इतना बड़ा था की एक बार जब प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी अपने रैली के दौरान सभा में देर से आई थीं, इस बात को लेकर बीपी सिन्हा बहुत नाराज हुए थे, जिसको लेकर इंदिरा गाँधी को भरी सभा में जनता से क्षमा माँगनी पड़ी थी | उनकी प्रभुता के किस्से में एक अध्याय यह भी जुड़ा है की उन्होंने अपने माली बिंदेश्वरी दुबे’ को मजदूर संघ का नेता तक बना डाला था | वे कांग्रेसी थे और उनका कद इतना बड़ा था की उन दिनों भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी वार्तालाप हॉटलाइन पर हुआ करती थी |

इन्ही दिनों बीपी सिन्हा के गैंग में शामिल होता है राजपूत जाति का एक श्रमिक सूरजदेव सिंह, जो की उत्तर प्रदेश के बलिया जिले का रहने वाला था | कुछ समय पश्चात बीपी सिन्हा से नजदीकियां बढाकर वह मजदूर सूरजदेव सिंह, सिन्हा जी के बॉडीगार्ड के साथ साथ भरोसे की बदौलत दाहिना हाथ तक बन जाता है | कालांतर में सूरजदेव सिंह बीपी सिन्हा का साथ पाकर अंदरूनी तौर पर मजबूत होते चले जाते हैं | तत्कालीन बिहार और उत्तर प्रदेश राजनीति से ग्रसित हो चुकी थी, जतिगत बोलबाला शरू हो चूका था, यह प्रसिद्ध कहावत “ लाठी हमारी तो मिल्कियत भी हमारी ” चरितार्थ हो रही थी | छिटपुट घटनाओं में अब तक दर्जनों लाशें बिछ चुकी थीं, इन लड़ाइयों में तत्कालीन बिहार और उत्तर प्रदेश के बड़े से बड़े क्रिमिनल शामिल थे | इसकी गूंज बिहार और दिल्ली की सत्ता के गलियारों से लेकर पार्लियामेंट तक सुनाई पड़ रहीं थी | ए+बी+सी=डी काफी प्रचलित हो चूका था, इस एब्रीविएशन का अर्थ था आरा + बलिया + छपरा = धनबाद | बीपी सिन्हा को कोयलांचल में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था, पर वह हताश नहीं हुए थे, अपने शागिर्दों के दम पर उनकी रियासत कायम थी |

केंद्र की सत्ता से बेदखल हुई इंदिरा गांधी के विरोधी लहर के दौरान विरोधी बीपी सिन्हा के इस वर्चस्व को तोडऩे के लिए मौके की तलाश में थे | वैसे भी सूरजदेव सिंह बीपी सिन्हा से अलग हटकर काम करने को आतुर था | पूर्व प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के युवा नेता ‘चंद्रशेखर’, जो की वह भी जाति से राजपूत ही थे, अपना पूरा ताकत लगा चुके थे, कहा जाता है सूरजदेव सिंह उनके करीबी मित्र थे | 1977 में सूरजदेव सिंह को जनता पार्टी से टिकट मिली थी और वह उस एरिया से विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधायक बन चुके थे । कहते हैं बीपी सिन्हा से सूरजदेव सिंह की दूरियां बढती चली जा रही थी, फिर भी उनका अपने पुराने शागिर्द सूरजदेव देव सिंह पर जबरदस्त भरोसा कायम था | सूरजदेव सिंह का रात -बिरात बीपी सिन्हा का कथित आवास ‘व्हाइट हॉउस’ पर आना जाना लगा रहता था | फिर अचानक 28 मार्च 1979 की रात अपने ने ही वह करतूत कर डाला जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, व्हाइट हॉउस खून से सराबोर हो चूका था | काले हीरे के सरताज अलविदा हो चुके थे, कहा जाता है दगा देकर उनकी हत्या बहुत ही क्रूर तरीके से की गई थी | हत्या का आरोप उन्हीं लोगों पर लगा जो उनके अपने शागिर्द थे | कोयलांचल के सुप्रीमो कोल माफिया बीपी सिन्हा के मौत के बाद उनके राजनीतिक शिष्य सूर्यदेव सिंह सुर्खियों में आए थे | व्हाइट हॉउस की चमक अब खत्म हो चुकी थी और सूरजदेव सिंह का ‘सिंह मैन्सन’ जगमगाने लगा था | कुछ भी हो भले ही चमक अब खत्म हो चुकी पर ‘व्हासइट हॉउस’ आज भी कोल नगरी के बेताज बादशाह के बुलंदियों की कहानी बयान करती है और कहा जाता है जगमगाते ‘सिंह मैन्सन’ में कई विधवाएँ रहती हैं |

हाल फिलहाल में सिनेमा घरों में अनुराग कश्‍यप की बहुचर्चित फिल्‍म “ गैंग्स आफ वासेपुर “ रिलीज हुई, यह सिनेमा धनबाद कोल माफियाओं पर आधारित थी | अनुराग ने अपने फिल्म में जिस वासेपुर को दिखाया है वह यहां के के सच से भले ही मेल नहीं खाता हो, लेकिन गैंगवार वासेपुर और पूरे कोयलांचल की एक हकीकत है | इससे पहले भी 1979 में कोयलांचल पर बॉलीवुड के मशहूर निर्माता – निर्देशक यस चोपरा के बैनर तले एक सुपरहिट फिल्म बन चुकी है ” काला पत्थर “, मुख्य किरदार के तौर पर थे, अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा एवं शशि कपूर |

(इतिहास को याद रखना आवश्यक है, समय पर इसकी जरुरत पड़ती है, जो इतिहास को भूलते हैं, चूक उन्ही से होती है और दगा की वजह शिकार बन जाते हैं | कहते हैं इतिहास अपने को दोहराता है | वैसे आपलोग ने इतिहास में राजा जयचंद की कहानी पढ़ी ही होगी )

Source : facebook

कौन है तनवीर हसन||tanveer Hassan

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तनवीर हसन का जन्म 1 जनवरी, 1957, बलिया (लखमीनिया), जिला बेगूसराय में हुआ उन्होंने एम.ए., एल.एल.बी., पी-एच.डी. तक शिक्षा प्राप्त की।

छात्रजीवन से ही छात्र संगठन के सदस्य, 1974 के छात्र आंदोलन में सक्रिय भूमिका, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय छात्र सीनेटर निर्वाचित एवं छात्र आंदोलन में अग्रणी भूमिका, प्रदेश छात्र सभा के संस्थापक अध्यक्ष मनोनीत, राज्य स्तर पर छात्र आंदोलन का सफल नेतृत्व तथा जेल यात्रा, 1985 में जनता पार्टी के टिकट पर बलिया विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से प्रथम बार चुनाव लड़े तथा असफल रहे एवं कालान्तर में प्रदेश युवा जनता के कार्यकारी अध्यक्ष मनोनीत, 1990 में विधान सभा क्षेत्र से बिहार विधान परिषद् के सदस्य निर्वाचित, 1994 में बिहार प्रदेश युवा जनता दल के अध्यक्ष मनोनीत किए गये। वर्ष 1990 से 1996 एवं 1996 एवं 2002 तथा 2002 से 2008 तक विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से बिहार विधान परिषद् के सदस्य निर्वाचित हुए तथा मिथिला विश्वविद्यालय के सिंडिकेट के सदस्य निर्वाचित किए गए। पुन: 2008 में विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से बिहार विधान परिषद् के सदस्य निर्वाचित हुए। कई विश्वविद्यालयों के सिनेट एवं सिंडिकेट के सदस्य तथा शैक्षिक संस्थाओं के संचालक का कार्य।

विश्व युवा महोत्सव में 1985 में सोवियत संघ में आयोजित
भारत का प्रतिनिधित्व किया।

Writter :

एडवोकेट शमशाद पठान
अहमदाबाद गुजरात

Koppel climate classification 

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The modified Köppen Climate Classification System is the mostwidely used system for classifying the world’s climates. Its categories are based on the annual and monthly averages of temperature and precipitation. The Köppen system recognizes six major climatic types; each type is designated by a capital letter.

Various attempts have been made to classify the climates of the earth into climatic regions. One notable, yet ancient and misguided example is that of Aristotle’s Temperate, Torrid, and Frigid Zones. However, the 20th century classification developed by German climatologist and amateur botanist Wladimir Köppen (1846-1940) continues to be the authoritative map of the world climates in use today.

Introduced in 1928 as a wall map co-authored with student Rudolph Geiger, the Köppen system of classification (map) was updated and modified by Köppen until his death. Since that time, it has been modified by several geographers.

The modified Köppen Climate Classification System is the most widely used system for classifying the world’s climates. Its categories are based on the annual and monthly averages of temperature and precipitation. The Köppen system recognizes six major climatic types; each type is designated by a capital letter.

In addition to the major climate types, each category is further sub-divided into sub-categories based on temperature and precipitation. There are only 24 sub-categories possible – making the general schemes quite easy to comprehend.

For example, the U.S. states located along the Gulf of Mexico are designated as “Cfa.” The “C” represents the “mild mid-latitude” category, the second letter “f” stands for the German word feuchtor “moist,” and the third letter “a” indicates that the average temperature of the warmest month is above 22°C. Thus, “Cfa” gives us a good indication of the climate of this region, a mild mid-latitude climate with no dry season and a hot summer.

The Köppen classification code (and some statistics) was adapted (with permission of Peter Schild) from the COMIS weather program code

Köppen’s classification identifies six C climates and eight D climates:
  • Humid subtropical climate (Cfa, Cwa)
  • Mediterranean climate (Csa, Csb)
  • Marine west coast climate (Cfb, Cfc)
  • Humid continental climate (Dfa, Dfb, Dwa, Dwb)
  • Continental subarctic climate (Dfc, Dfd, Dwc, Dwd)

The five primary classifications can be further divided into secondary classifications such as rainforest, monsoon, tropical savanna, humid subtropical, humid continental, oceanic climate, Mediterranean climate, desert, steppe, subarctic climate, tundra, and polar ice cap.

Venezuela नामक देश के बारे में सुना है ??

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काफी बड़ा देश है, इतना बड़ा कि हमारा पूरा UP , बिहार , पंजाब , हरियाणा , बंगाल उड़ीसा मिला दो , इससे भी बड़ा ……..

और जनसंख्या कितनी है ? सिर्फ साढ़े तीन करोड़ ……. मने दिल्ली NCR की आबादी से भी कम ……..
भगवान का दिया सब कुछ है । क्या शानदार उपजाऊ जमीन है , प्रचुर वर्षा होती है । सैकड़ों छोटी बड़ी नदियां है …… हज़ारों मील लंबा तो समुद्र तट ही है ……..

इतनी उपजाऊ जमीन और इतना पानी होने के बावजूद देश में आज वो भुखमरी फैली है कि आदमी आदमी को मार के खा रहा है ……. देश मे खेती किसानी, फल सब्जी, dairy, poultry, मछली, fishing जैसा कुछ है ही नहीं । मने इतना बड़ा देश अपने लिए गेहूं , चावल ,सब्जी नहीं उगा सकता ??????
लाखों वर्ग किलोमीटर के तो चारागाह हैं ……. ये नहीं कि कुछ गाय, भैंस, भेड़, बकरी ही चरा ले मुल्क ……. नदियों समंदर में मछली की भरमार है, Venezuela फिर भी भूखा मर रहा है । मुद्रा स्फीति का ये हाल है कि बैग भर Bolivar भर के ले जाओ तो भी एक पाकिट bread का नहीं मिलेगा, Inflation की दर पिछले साल की तुलना में 16,98,488 % है । आज आपको एक भारतीय रुपये के बदले में 3607 Venezuela की मुद्रा Bolivar मिलेगी ।

आपको ये जान कर भी आश्चर्य होगा कि Venezuela में दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल के भंडार हैं ……. सऊदी अरबिया से भी बड़े ……..

आपको ये जान कर भी आश्चर्य होगा कि आज से सिर्फ 20 साल पहले Venezuela एक विकसित और संपन्न राष्ट्र था , पर इसके नेताओं की गलत नीतियों ने एक सम्पन्न राष्ट्र को सिर्फ 20 साल में भिखारी बना दिया ।
आज ये हाल है कि वेनेजुएला की अधिकांश लड़कियां Bread के सिर्फ एक टुकड़े के लिए अपना शरीर बेच रही हैं …….. वेश्यावृत्ति कर रही हैं ।

एक अच्छा leader अपने देश को 20 साल में सिंगापुर बना सकता है और एक नालायक leader अपने देश को Venezuela बना देता है ।

क्या गलती की थी वेनेजुएला के Leaders ने …….

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद , जब पूरी दुनिया में तेल की जबरदस्त demand थी और दाम आसमान छू रहे थे , Venezuela की पांचों उँगलियाँ घी में थीं । 1945 में ही देश रोज़ाना 1 Million Barrel तेल बना रहा था, सरकार ने अपने नागरिकों को खैरात बांटना शुरू किया ।

देश की हर सेवा सरकारी थी और हर सेवा Free थी ।
तेल के बदले में दुनिया भर से सामान आता था, राशन, अनाज, फल, सब्जी, दवाइयां, मशीनरी, कपड़ा हर चीज़ Import ही होती थी । तेल के बदले में ……. और सरकार अपने नागरिकों को सबकुछ फ्री देती थी ।
50 और 60 के दशक में जब कि सारी दुनिया हाड़ तोड़ मेहनत कर उत्पादन Manufacturing में लगी थी , Venezuela में एक सूई तक न बनती थी और उनकी तो गोभी और टमाटर भी यूरोप से आती थी ।

बहुत खूबसूरत देश है Venezuela..… पर यदि कोई Tourist भूला भटका आ भी जाता तो पूरे देश मे कोई उसको पानी पूछने वाला न था …..… आमतौर पे ऐसे देशों में बाहर से विदेशी आ जाते हैं रोज़ी रोज़गार की तलाश में , पर चूंकि इस देश में फ्री सेवा थी, इसलिए सभी पार्टियां और जनता विदेशी लोगों के देश में प्रवेश के खिलाफ थी कि हमारी मुफ्त सेवा का लाभ विदेशी क्यों लें ।
इसका नतीजा ये हुआ कि कोई नागरिक खुद तो कुछ करता नहीं था, खेती बाड़ी, कोई उद्योग धंधा और बाहर से लेबर ही import कर ले सरकार , ये होने नहीं देता था, इसलिए देश में Tourism तक develop न हुआ ।
बताया जाता है कि 70 के दशक में अगर भूला भटका सैलानी अगर आ भी जाता तो ये उससे कहते ……. FCUK off …….

फिर एक दिन तेल के दाम गिरने लगे …….. सरकार की एक तेल कंपनी थी …… PDVSA …… सरकार ने कंपनी से कहा , सबको नौकरी दे दो, कंपनी बोली हुज़ूर हमको employee की ज़रूरत ही नहीं ……. सरकार बोली , फिर भी दे दो ……. इस तरह सरकार ने हर परिवार के कम से कम एक आदमी को सरकारी तेल कंपनी PDVSA में नौकरी दे दी, जहां वो कोई काम नहीं करता था और मुफ्त की मोटी पगार लेता ……..
फिर तेल के दाम और गिरे …….. अब जब तेल कंपनी बुरी तरह घाटे में आ गयी और तेल बिकना बंद हो गया तो खैरात भी बंद हो गयी ………
धीरे धीरे हर चीज़ की कमी होने लगी ।
3.5 करोड़ मुफ्तखोर जिनने ज़िन्दगी में कोई काम नहीं किया था वो लूट खसोट करने लगे ।

लड़कियां सब वेश्यावृत्ति में उतर गई ।
समाजवादी सरकार फिर भी नहीं चेती …….. वो कर्ज़ा ले के घी पिलाने लगी अपनी मुफ्तखोर जनता को ……..

आज राजधानी कराकास दुनिया का सबसे असुरक्षित शहर है जहां एक Bread के टुकड़े के लिए हत्या हो जाती है और लड़कियां सिर्फ एक पीस bread के लिए शरीर बेचती हैं ।
डेढ़ करोड़ बोलिवर में एक थाली खाना मिलता है ……..

1999 के बाद देश की ये दुर्दशा शुरू हुई …….

इतना बड़ा देश सिर्फ 3.5 करोड़ लोगों के लिए गेहूं चावल सब्जी दूध पैदा नहीं कर सकता ?????

मैं कहता हूँ कि आज अगर वेनेजुएला की सरकार यहां पंजाब से सिर्फ 1000 किसानों को अपने यहां आमंत्रित कर ले और सिर्फ जरूरी मशीनरी दे दे तो सिर्फ 6 महीने में हमारे किसान इतना अनाज, सब्जी, फल और दूध पैदा कर देंगे कि पूरे वेनेजुएला से खाया न जाये …….. अकेला एक कपूरथला जिला इतना खरबूजा पैदा करता है कि पूरा North India खाता है …….

सवाल है कि सरकार ने ये मुफ्तखोरी अपने नागरिकों को क्यों सिखाई ?
अपने देश की जनता को निकम्मा, नकारा, हरामखोर किसने बनाया ?
जब इतनी भुखमरी है देश में तो भी क्या जनता अपने घर के पिछवाड़े घीया तोरी कद्दू के बीज सिर्फ डाल दे तो भी दो महीने में इतनी सब्जी हो जाएगी कि उसको उबाल के खा के पेट भर लेंगे लोग ……..
पिछले 10 साल से भुखमरी है देश में …….. न सरकार चेती न जनता ???????

आज राहुल G चुनावी वादा कर रहे कि 5 करोड़ गरीब परिवारों को 6000 महीना 72000 सालाना दे के भारत में 7 venezuela बनाना चाहते हैं ।
3.5 करोड़ लोगों का एक Venezuela है ।
राहुल G 25 करोड़ लोगों को मुफ्तखोर बनाना चाहते हैं यानी 7 Venezuela ………

राहुल G / कांग्रेस की इस मुफ्तखोरी योजना का बजट होगा 3 ,60,000 करोड़ रु. यानी हमारे कुल रक्षा बजट से भी ज़्यादा ……..

Congress सत्ता में वापसी के लिए इस देश को Venezuela बना देगी ………

Congress से बचो …..🙏

American school of subareial and Denudation in geomorphology

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subaerial
existing, occurring, or formed in the open air or on the earth’s surface, not under water or underground.

In natural science, subaerial (literally “under the air”), has been used since 1833, notably in geology and botany, to describe events or features that are formed, located, or taking place immediately on or near the Earth’s land surface. They are thus exposed to Earth’s atmosphere.

Geologists today may be divided into two schools regarding the origin of regions of comparatively smooth surface from which a large volume of overlying rocks have been removed. These regions occur under two conditions: First, as buried “oldlands” on which an unconformable cover of later formations has been deposited, the oldlands being how more or less locally revealed by the dissection or stripping of the cover; second, as uplands or plateaus whose once even surface is now more or less roughened by the erosion of valleys.

The older school, now represented chiefly by English geologists, follows the theory of Ramsay, and regards these even oldlands as plains of marine denudation. The newer school, represented chiefly by American geologists, but also by a number of continental European geologists, may be said to follow Powell, who first emphatically called attention to the possibility of producing plains by long continued subaerial depudation. . . .